झुके मस्तक झुकी पलकों को इबादत मान बेठे हो.....
उसने बनाई हैं साजिसे तुम शरारत मान बेठे हो.....
मोहब्बत का, नहीं मालूम , उसे एक हर्फ़ भी लकिन,
तमाशा -ऐ-नुमाइश को मोहब्बत मान बेठे हो......
नगीने को नहीं मालूम वो कितना खुबसूरत हैं....
चाँद तारो की जगह अब हमे तेरी जरुरत है......
झठ कहते हैं जो कहते तुम खुदा मूरत हो.......
उन्हें नहीं मालूम हे इतना खुदा तेरी ही मूरत हैं......
अरसा बीत गया अब सब सुच याद नहीं हो सकता .....
पर ये भी हकीकत हैं कोई तुम्हारे बाद नहीं हो सकता....
मुझे खुदा के बनाये यकीन पर इतना तो यकीन हैं....
मेने टूटकर किया था जो इश्क वो बर्बाद नहीं हों सकता.....
जो कहकर मुझे छोटा , दरिया सी हद बताते हैं....
उन्हें अक्सर कुछ तीनके भी उनका कद बताते हैं.....
और खुदा ने हम सबको बस एक बनाया था....
खीच जमीन पर लकीरे वो उन्हें सरहद बताते हैं....
न करना कुछ भी ऐसा , में मगरूर हो जाऊ....
खुद को खुदा मान बेठु नशे में चूर हो जाऊ......
अभी तो तुम ही हो जरुरत मेरी सांसो की .......
न हो एसा के में उन सांसो से भी दूर हो जाऊ....
तेरे नूर के सामने ये ताज तो बस धुल है
तुझसे इश्क ,गुन्हा है तो गुनाह कुबूल है
दिल से मत लगाना इस लोगो की बातो को
इनके लिए कल भी भूल थी आज भी भूल है
भला कब तक रखोगे फूल तुम अपनी किताबो में
आज कह दो उन्हें जाकर तुम आती हो ख्वाबो में
जो पूछते है सवाल ,जवाब उनको ही मिलता है
नहीं मिलता उन्हें कुछ भी जो उलझते है जवाबो में
कहने को लहरों का रुख भी मोड़ देते है
पथरो के हवाले अपना दिल छोड देते है
पर अजब हें इन आशिको की आशिकी भी
इक दिल जोड़ने में कितनी कलि तोड़ देते है
चाँद अगर रात से दूर होने लगे
हर कोई राह में फिर खोने लगे
और ये नदिया समन्दर हो जाएँगी
जेसे तुम रोते अगर हम रोने लगे
चाँद बिन चांदनी तेरा एहसास क्या.....
जानकी भी जले तो फिर विश्वास क्या......
और तुम साथ थे सब यही था कही ......
अब जब तुम ही नहीं तो मेरे पास क्या ..
जो लोग इश्क में गिरकर संभल जाते है
वो लोग कुछ इस कदर बदल जाते है
देखते हे जब जब आसमान में नमी
पतंगे लेते है और उड़ाने निकल जाते है
आज तो कोई तुमपर फनाह होता हैं
कल का क्या हे पता कल क्या होता हैं
कोई खेल सकता हे किसी से तब तक ही तो
जब तक किसी में बाक़ी बचपना होता हे
गमो में भी मुस्कुराना कभी कम नहीं करते
कलंदर हे कुछ पाने या खोने का गम नहीं करते
मिटा सकते हो तो मिटा देना वजूद हमारा
पर हवाओ से चिरागओ की हिफाजत हम नहीं करते
तुमने भरी भीड़ में हाथ छोड़ा पर खोये हम नहीं
तन्हा थे घबराना लाजमी था पर रोये हम नहीं
तुमने यही सोचा होगा खवाबो में आकार सतोगी मुझे
कफ़न में लिपटी रही लाश मेरी पर देखो सोये हम नहीं
उसने बनाई हैं साजिसे तुम शरारत मान बेठे हो.....
मोहब्बत का, नहीं मालूम , उसे एक हर्फ़ भी लकिन,
तमाशा -ऐ-नुमाइश को मोहब्बत मान बेठे हो......
नगीने को नहीं मालूम वो कितना खुबसूरत हैं....
चाँद तारो की जगह अब हमे तेरी जरुरत है......
झठ कहते हैं जो कहते तुम खुदा मूरत हो.......
उन्हें नहीं मालूम हे इतना खुदा तेरी ही मूरत हैं......
अरसा बीत गया अब सब सुच याद नहीं हो सकता .....
पर ये भी हकीकत हैं कोई तुम्हारे बाद नहीं हो सकता....
मुझे खुदा के बनाये यकीन पर इतना तो यकीन हैं....
मेने टूटकर किया था जो इश्क वो बर्बाद नहीं हों सकता.....
जो कहकर मुझे छोटा , दरिया सी हद बताते हैं....
उन्हें अक्सर कुछ तीनके भी उनका कद बताते हैं.....
और खुदा ने हम सबको बस एक बनाया था....
खीच जमीन पर लकीरे वो उन्हें सरहद बताते हैं....
न करना कुछ भी ऐसा , में मगरूर हो जाऊ....
खुद को खुदा मान बेठु नशे में चूर हो जाऊ......
अभी तो तुम ही हो जरुरत मेरी सांसो की .......
न हो एसा के में उन सांसो से भी दूर हो जाऊ....
तेरे नूर के सामने ये ताज तो बस धुल है
तुझसे इश्क ,गुन्हा है तो गुनाह कुबूल है
दिल से मत लगाना इस लोगो की बातो को
इनके लिए कल भी भूल थी आज भी भूल है
भला कब तक रखोगे फूल तुम अपनी किताबो में
आज कह दो उन्हें जाकर तुम आती हो ख्वाबो में
जो पूछते है सवाल ,जवाब उनको ही मिलता है
नहीं मिलता उन्हें कुछ भी जो उलझते है जवाबो में
कहने को लहरों का रुख भी मोड़ देते है
पथरो के हवाले अपना दिल छोड देते है
पर अजब हें इन आशिको की आशिकी भी
इक दिल जोड़ने में कितनी कलि तोड़ देते है
चाँद अगर रात से दूर होने लगे
हर कोई राह में फिर खोने लगे
और ये नदिया समन्दर हो जाएँगी
जेसे तुम रोते अगर हम रोने लगे
चाँद बिन चांदनी तेरा एहसास क्या.....
जानकी भी जले तो फिर विश्वास क्या......
और तुम साथ थे सब यही था कही ......
अब जब तुम ही नहीं तो मेरे पास क्या ..
जो लोग इश्क में गिरकर संभल जाते है
वो लोग कुछ इस कदर बदल जाते है
देखते हे जब जब आसमान में नमी
पतंगे लेते है और उड़ाने निकल जाते है
आज तो कोई तुमपर फनाह होता हैं
कल का क्या हे पता कल क्या होता हैं
कोई खेल सकता हे किसी से तब तक ही तो
जब तक किसी में बाक़ी बचपना होता हे
गमो में भी मुस्कुराना कभी कम नहीं करते
कलंदर हे कुछ पाने या खोने का गम नहीं करते
मिटा सकते हो तो मिटा देना वजूद हमारा
पर हवाओ से चिरागओ की हिफाजत हम नहीं करते
तुमने भरी भीड़ में हाथ छोड़ा पर खोये हम नहीं
तन्हा थे घबराना लाजमी था पर रोये हम नहीं
तुमने यही सोचा होगा खवाबो में आकार सतोगी मुझे
कफ़न में लिपटी रही लाश मेरी पर देखो सोये हम नहीं
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