कितनी मगरूर है वो , खुद को क्या समझती है
मेरे उड़ने के मंसूबो को, वो बस हवा समझती है
उसीके नाम से हीचकिया अभी बंद होती है
तो भला केसे वो खुद को मुझसे जुदा सम्झती हैं
उसे कहु पागल या कहु अभी नादानी बाकि है
हमने हाथ क्या जोड़े, वो खुद को खुद
समझती है
दोनों को ही वफा के मायने नहीं थे मालूम
फिर भी वो बस हमे ही बेवफा समझती है
मेरे उड़ने के मंसूबो को, वो बस हवा समझती है
उसीके नाम से हीचकिया अभी बंद होती है
तो भला केसे वो खुद को मुझसे जुदा सम्झती हैं
उसे कहु पागल या कहु अभी नादानी बाकि है
हमने हाथ क्या जोड़े, वो खुद को खुद
समझती है
दोनों को ही वफा के मायने नहीं थे मालूम
फिर भी वो बस हमे ही बेवफा समझती है
No comments:
Post a Comment