Monday, 14 July 2014

गुमशुदा हो गए है कही अल्फाज मेरे।

गुमशुदा हो गए है
कही अल्फाज मेरे।

हाँ ,हाँ वही 
जो तुमपर शायरी किया करते थे।
तुम्हारा नाम लेकर कागज पर उतरते थे।
जिन्हें में मोटी मोटी किताबो से लाया था।
जिनमे में और मेरा इश्क समाया था।
अब केसे बताऊंगा में
कोरे पन्नो को राज मेरे।
गुमशुदा हो गए हैं
कही अल्फाज मेरे।

अब वो अश्को की रोशनाइ, किस काम आएगी।
कोरे कागजो पर बस, चंद लकीरे खिच जाएँगी।
जिनका शायद कोई ,मतलब भी ना निकाल पाए।
जिन्हें कोई किताब, ज्यादा वक्त तक ना संभाल पाए।
फिर अब केसे बनेगे वो ,
तन्हा लम्हे हमराज मेरे।।
गुमशुदा हो गए हैं
कही अल्फाज मेरे।।

तारो भरी रात को काटु किसके सहारे।
पहले किस्से होते थे मेंरे और तुम्हारे।
ये चाँद कम्भकत रोज आता नहीं।
सूरज में तेरा अक्स में ढूंड पाता नहीं।
अब केसे ना रूठे
मुझसे ये साज मेरे।
गुमशुदा हो गए हैं
कही आल्फाज मेरे।।

रूठे हुए अल्फाज ,मिले कही किसी मोड़ पर।
उनसे कहना चले आये, सारी ज़िद्द छोडकर।
क्योकि उनके बिना अधुरी हैं ,हर कहानी।
चाहे हो जाये कितनी, मीरा औगर राधा दीवानी।
बिन लफ्जो के कुछ
नहीं है परवाज मेंरे।।
गुमशुदा हो गए हैं
कही आल्फाज मेरे।।

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