Saturday, 18 January 2014

चाँद आज वक्त से पहेले ही चले आना छत पर

यु तो हर रोज आफताब, सहर को छुआ करता हे
पर इंतजार का मजा तो कभी कभी हुआ करता हे
चाँद आज वक्त से पहेले ही चले आना छत पर मेरी
क्योकि मेरा चाँद मेरी सलामती की दुआ करता हे ..

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आखिर इस इश्क का ये केसा अंदाज़ हे

आखिर इस इश्क का ये केसा अंदाज़ हे
जिसको भी पूछा वही बोला बस एक राज हे
और हमने जिसकी खातिर जहा से बैर रखा
अरे देखो आज वो ही हमसे नाराज हे

ये जो भीगी पलकों के साथ हम मुसकुराने लगे हे
या तो कोई बीमारी हे या ये इश्क का आग़ज हे
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रूपइया हाय रूपया.................... रुपइया हाय रूपया

चलो तुम्हे समझता हु में क्या हे रूपये का मोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ........रुपइया हाय रूपया
भाई भाई का बहुत हुआ अब माँ बेटे का बटवारा हैं
ममता भी अब लगी है बिकने ये बेटा कितना बेचारा है 
भाई के खाली हाथ देखकर बहन ने राखी है तोड़ी
हर रिश्ता बिखरा ऐसे जेसे बिखरी हो कोडी
चन्द रुपियो के चक्कर में खुलती रिस्तो की पोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.............. रुपइया हाय रूपया
जिसकी जेब हो हरी भरी वो लगता थानेदार यहा
जिसकी जेब कुछ ना खनके उसका जीना बेकार यहा
रात दिन बस गिनते जाए ऐसे ही सबके सपने हे
कागज पर हे छपे जो बापू बस वो बापू अपने हे
क्यों पूजे गाँधी को दुनिया ये बात बड़ी अनमोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ..............रुपइया हाय रूपया
एक के बदले दो मिल जाये हमको तो नींद नहीं आती
कल का सूरज कल देखेंगे आज की चिंता हे खाती
रूपये की माया तो बस ये रूपये वाले ही जाने हे
गरीब के मुह तो ना लग पाते चैन से दो भी दाने हे
कब तक ऐसे सहते जाये खुदा अब तो आंखे खोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ...........रुपइया हाय रूपया
रोज रोज ये गिरकर भी देखो अपने दाम बढाता हे
स्वीज बैंक बेठा बेठा हमपर हुकुम चलता हे
इसकी क्या ओकात अगर हम इसको भाव नहीं देंगे
इस रूपये चक्कर में हम अपनो को घाव नहीं देंगे
फिर खुद ही सुलझेगा है जो भी रुपये का झोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.................... रुपइया हाय रूपया



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देखो सोये हम नहीं

तुमने भरी भीड़ में हाथ छोड़ा पर खोये हम नहीं
तन्हा थे घबराना लाजमी था पर रोये हम नहीं
तुमने यही सोचा होगा खवाबो में आकार सतोगी मुझे
कफ़न में लिपटी रही लाश मेरी पर देखो सोये हम नहीं


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भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं


उनकी आँखों में काजल के जगह पानी रहा करता हैं
हर लब तड़प से नजाने कितनी दफा आह भरता हैं
जिन हाथो को किस्मत चमकानी वो जूते और कार चमकाते हैं
कुछ बच्चे उसी चोराहैं पर भीख मांग कर खाना खाते हैं
कितनो को तो मांगना भी नहीं आता बस कटोरा हिला देते हैं 
इस कदर रोज वो मासूम अपना बचपन जला देते हैं
आखिर क्या हैं वो जिसने इनसे इनका बचपन छला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

उसी चोराहैं पर कुछ बच्चे बच्चो के खिलोने बेचा करते हैं
आते जाते बच्चो को देख बस यही सोचा करते हैं
कोई उनका हमउम्र ही जिदद करे और खरीदे खिलोने उनके
जिससे अपना पेट भरने को ला सके वो बस चंद तिनके
जिस उम्र में बच्चे अपने खिलोने लोगो को दिखने से डरा करते
और ये मासूम उसी उम्र में उन खिलोनो का सोदा करते हैं
ये केसी आग हैं जिसमे कितने मासूमो का बचपन जला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

चोराहैं से आगे तंग गलियों में नन्हे हाथो में चाकू या खंजर भी मिलेंगे
दर्द से तडपते लाचार बेबस और भी कितने ही मंजर मिलेंगे
वहां हर आंख एक निवाला देखने को भी तरसा करती हैं
अगर कभी मिल जाये हकीकत में खुशियों से बहुत बरसा करती हैं
पेट भर कर खाना इसी जुर्रत तो वो ख्वाब भी नहीं करते हैं
ओकात जानते हैं अपनी इसलिए वो कोई सवाल कोई जवाब नहीं करते
एक नन्हा सा कदम जिसकी वजह से इतना गुमराह होकर चला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वही बदनसीब बला हैं

आगे चलना वही हा थोड़ी दुरी पर कुछ झूठे पत्तल पड़े होंगे
थोडा नजर भी उठाना क्योकि उसके आस पास कुछ बच्चे खड़े होंगे
जो इस आस में वह टकटकी लगाये खड़े हैं कुछ तो मिल जायेगा
कल का कल देखेंगे कम से कम आज का काम तो चल जायेगा
इतने में वहा एक भूखा कुत्ता उन पत्तलो को चाटने लगता हैं
देखते ही देखते वो झूठन भी उसने बाटने लगता हैं
रात भर तडपाकर आखिर किसने उनकी नींदों को खला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

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वो बचपन अच्छा था

इन टूटे दिलो से तो वो टूटे खिलोने अच्छे थे
इन बड़े बड़े महलो से वो छोटे छोटे कोने अच्छे थे
इन फरेबी मुस्कराहट से तो वो खिलखिलाना अच्छा था
अश्क छुपाने से वो चोट छुपाना अच्छा था
जिन्दगी की मार से वो बड़ो का मरना अच्छा था
आज की जीत से वो तब का हारना भी अच्छा था
इन जिम्मेदारियों के बोझ से तो वो बसते का वजन अच्छा थे
कुछ भी कहो यारोइस जवानी से
वो बचपन अच्छा था


खुद कमाये हजारो से वो जिद्द का रूपया एक अच्छा था
जन्मदिन पर बड़ी बड़ी दावतो से वो दो रूपये का केक अच्छा था
नजरे चुराने से वो दुसरो का टिफिन चुराना अच्छा था
इस सन्नाटे से वो लाई ट जाने पर जो मचाया वो शोर मचानाअच्छा था

इतने व्यस्त रहने से वो वक्त की बर्बादी भी अच्छी थी
आज की खुली छूट से बंधन वाली आजादी अच्छी थी
इन मतलब के यारो से वो सच्चा दुश्मन भी अच्छा थे
कुछ भी कहो यारो इस जवानी से वो बचपन अच्छा था

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तुझको भुलाने के लिए

कम हे इक सावन भी मेरा दर्द दिखाने के लिए
बस याद ही काफी हे तेरी तुझको भुलाने के लिए

क्यों बताते हो हाले- ऐ- दिल उस पगली का तुम मुझे
वो तिरछी निगाहे ही काफी हे मेरा दिल जलाने के लिए

सांस् भी भरता हु तो एक बोझ सा लगता मुझे
तू ही बता में क्या करू कर्ज तेरा चुकाने के लिए
हर कोई देखता हे रहम की नजरो से अब
काला चस्मा भी लगाया सब कुछ छुपाने के लिए
कम हे इक सावन भी मेरा दर्द दिखाने के लिए
बस याद ही काफी हे तेरी तुझको भुलाने के 
लिए

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केसे हो सकता हे ?

कोई खंजर इश्क की निशानी केसे हो सकता हे ?
तेरे जाने के बाद मेरी नई कहानी केसे हो सकता हे?
और तुमने खुद ही तो तोडा हे रिश्ता मुझसे
अब तुम्हारी आँखों में पानी केसे हो सकता हे?

सब कुछ अपना इश्क में लुटा दिया मेने
एक फ़क़ीर के जेब में रूपया खानदानी केसे हो सकता हे ?

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गमो में भी मुस्कुराना

गमो में भी मुस्कुराना कभी कम नहीं करते
कलंदर हे कुछ पाने या खोने का गम नहीं करते
मिटा सकते हो तो मिटा देना वजूद हमारा
पर हवाओ से चिरागओ की हिफाजत हम नहीं करते


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दिलो को दिलो से मिलाता है जो इश्क करता हे इश्क कराता है वो..

दिलो को दिलो से मिलाता है जो
इश्क करता हे इश्क कराता है वो..

लिखता है कितनी ही वो अल्हड़ कहानी
कभी खुद है दीवाना कभी दुनिया दीवानी
कभी लिखता है सुखा वो गम के शहर में
कभी खुशियों के घर में छलकाता है पानी

बिना लफ्जो को सब समझाता है जो
इश्क करता है इश्क कराता है वो...

कभी शमा के लिए वो परवाना बने
कभी नफरत भुलाने का बहाना बने
भवरा वो बनकर कलियों की खिदमत करे
कभी राधा और मीरा का दीवाना बने

शास्त्र के नाम पर बंसी उठता है जो
इश्क करता है इश्क कराता है वो....

इश्क में तडपे खुद भी तडपाये हमे
अश्क पोंछे कभी तो कभी रुलाये हमे
नासमझ है हम जनता है वो सब
फिर जाने वो क्या क्या समझाता हमे

बेवजह ही हमे आजमाता है जो
इश्क करता है इश्क करता है वो...

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आज तो कोई

आज तो कोई तुमपर फनाह होता हैं
कल का क्या हे पता कल क्या होता हैं
कोई खेल सकता हे किसी से तब तक ही तो
जब तक किसी में बाक़ी बचपना होता हे

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जो लोग इश्क में

जो लोग इश्क में गिरकर संभल जाते है
वो लोग कुछ इस कदर बदल जाते है
देखते हे जब जब आसमान में नमी
पतंगे लेते है और उड़ाने निकल जाते है

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