आखिर हम क्यों नही भाप पाते आने वाले तूफान को
ऐ खुदा कुछ तो सहन शक्ति दी होती इस इंसान को
कल तक जो बस मेरी शिकंद पर जहा से बेर रखता था
आज नहीं पहचान पता मेरी दर्द भरी मुस्कान को
में बहुत रोया तडपा और बहुत कररहा था उस पल
पर मेरे जीने मेरे मरने में आखिर क्या लेना इस जहान को
ईट पत्थर और सीमेंट से नहीं मेहनत और सिद्ददत से बनाया था
तोड़ दिया तेरे चंद कडवे बोलो ने जिस माकन को
अब तो अपने भी परायो जेसा बर्ताव करने लगे हे
कम से कम कुछ तो लहजा सिखा इस जुबान को
इस संसार में खरीद्द्दर तो हर चोराहे पर मिलेगा
पर तू मेट बेक चाँद खोते सिक्को में इस इमान को
दिल तोड़ दिया अब दिलासा देने के लिए भी ना रुक
क्योकि में खुद ही खा देख पाउँगा आने वाले उफान को
सब तेरे पास बड़ी उम्मीद लेकर आते हे अगर झूठा हे
उनका भरोसा तो बंद कर ले अपनी इस दुकान को
अथिथि देवो भव का पाठ बच्चो को सिखाते रहे मगर
चार दिन से ज्यादा नही झेल पाए उस मेहमान को
और तुम्हारे गोरख धंदो का जो बेवजह शिकार हो गया
एक माँ छाती से लगाकर पला था उस जवान को
और धरती की खुसी के लिए अश्क बहाया करता हे असमान
वरना हमसे क्या लेना हे उस असमान को



