आफताब को पशचिम से निकलते देखा हे
मोम क्या हमने पहाड़ो को पिघलते देखा हे
गरीबी और पेट की आग भी कुछ एसी हे
के चोराहे पर भी चूल्हों को जलते देखा हे
यारी दोस्ती रिश्तेदारी की बात भी अब गुनाह हे
क्योकि सगे खून को भी दुश्मनी में बदलते देखा हे
जो कल तक हर लम्हा मेरे साये की तरह साथ था
उसकी ही आँखों में आज खुद को खलते देखा हे
मत कर गुरुर इस भले वक्त का इतना
हर आफताब को एक ना एक दिन ढलते देखा हे
जो आंख बंद करके बस सोने का दिखावा करते हे
उनकी आँखों में भी बड़े बड़े ख्वाबो को पलते देखा हे
गिरकर उठाना जमीन पर आखिर कोन सी बड़ी बात हे
नजरो में गिर लोगो को फिर सँभालते देखा हे
शायद सुख दुःख का कभी सामना नहीं होता पर
मेने अपनी राह-ए-जिन्दगी पर दोनों को साथ चलते देखा हे
बिना रोटी बिना कपडा और बिना मकान के भी
हर फकीरों के गुल को बड़ी खुददारी से पलते देखा हे
थोड़ी बहुत सोहरत थोड़ी बहुत दोलत पर इतराता हे
हमने बिन बरसतो के भी मेडको को उछालते देखा हे
बस अच्छी परवरिश की जरुरत हुआ करती हे
बंजर जमीन पर भी फूलो को खिलते देखा हे
और क्या बस भवरों का ही सारा कुसूर हे
नहीं बहुत सी कलियों के भी दिलो को मचलते देखा
हे
जिसने कभी किसी को नजर उठा कर नहीं देखा
उसको कदमो को भी उल्फत में फिसलते देखा हे
शायद तब से सावन का महिना दिल को भाने लगा हे
जबसे अपने अश्को को बारिश में घुलते देखा हे

No comments:
Post a Comment