Sunday, 30 September 2012

हम भी नहीं


तू हे हट्टा कट्टा अगर तो आखिर बीमार तो हम भी नहीं
मत उठा यु हाथ मुझपर क्योकि लाचार तो हम भी नहीं
लिखता होगा खुदा तू सच्ची और अच्छी पटकथाए
अच्छा लेखक अगर तू हे तो बुरे अदाकार तो हम भी नहीं

और मुझपर काबू पाने के लिए बहुत ज्हेम्त उठानी होगी तुझे
जो खुद ही हाथ में जाये वो शिकार तो हम भी नहीं

मोल हे इस जहा में अगर सबका ही कुछ ना कुछ
बिक तो हम भी जायेंगे आखिर इतने खुददार तो हम भी नहीं

तुम धन से साथ देते हो हम तन मन से साथ देते हे
तुम हो अगर देशभक्त तो आखिर कोई गद्दार तो हम भी नहीं

जो खेलकर भावनाओ से जीतती  हे और बाद में
हो जाती भ्रस्ट आखिर वो सरकार तो हम भी नहीं

धोका दिया तुने ही पर फिर तू खुद को नहीं मानती
बेवफा अगर तो इस बेवफाई के जिम्मेदार तो हम भी नहीं


अगर तेरे दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं तो ठीक हे
समां ले बेवजह किसी को खुद में वो मजधार तो हम भी ही नहीं

थोडा प्यार का दर्द हे जो बर्ताव में कमी हे मेरे
वर्ना मोहब्बत हम भी जानते हे खुखर तो हम भी नहीं

मुझसे जुदाई का दर्द साफ आँखों में छलकता हे तेरी
जो चेहरा भी ना पढ़  सके आखिर इतने गावर तो हम भी नहीं 

तब अगर एक दोस्त की जगह ही दे दी होती तुमने
अब आंशु तो पोछ देते आखिर बिलकुल बेकार तो हम भी नहीं

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