Monday, 14 July 2014

आखिर इस इश्क का ये केसा अंदाज़ हे
जिसको भी पूछा वही बोला बस एक राज हे
और हमने जिसकी खातिर जहा से बैर रखा
अरे देखो आज वो ही हमसे नाराज हे

ये जो भीगी पलकों के साथ हम मुसकुराने लगे हे 
या तो कोई बीमारी हे या ये इश्क का आग़ज हे

रुपइया हाय रूपया

चलो तुम्हे समझता हु में क्या हे रूपये का मोल 
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल 
रूपइया हाय रूपया ........रुपइया हाय रूपया
भाई भाई का बहुत हुआ अब माँ बेटे का बटवारा हैं 
ममता भी अब लगी है बिकने ये बेटा कितना बेचारा है 
भाई के खाली हाथ देखकर बहन ने राखी है तोड़ी
हर रिश्ता बिखरा ऐसे जेसे बिखरी हो कोडी
चन्द रुपियो के चक्कर में खुलती रिस्तो की पोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.............. रुपइया हाय रूपया
जिसकी जेब हो हरी भरी वो लगता थानेदार यहा
जिसकी जेब कुछ ना खनके उसका जीना बेकार यहा
रात दिन बस गिनते जाए ऐसे ही सबके सपने हे
कागज पर हे छपे जो बापू बस वो बापू अपने हे
क्यों पूजे गाँधी को दुनिया ये बात बड़ी अनमोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ..............रुपइया हाय रूपया
एक के बदले दो मिल जाये हमको तो नींद नहीं आती
कल का सूरज कल देखेंगे आज की चिंता हे खाती
रूपये की माया तो बस ये रूपये वाले ही जाने हे
गरीब के मुह तो ना लग पाते चैन से दो भी दाने हे
कब तक ऐसे सहते जाये खुदा अब तो आंखे खोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ...........रुपइया हाय रूपया
रोज रोज ये गिरकर भी देखो अपने दाम बढाता हे
स्वीज बैंक बेठा बेठा हमपर हुकुम चलता हे
इसकी क्या ओकात अगर हम इसको भाव नहीं देंगे
इस रूपये चक्कर में हम अपनो को घाव नहीं देंगे
फिर खुद ही सुलझेगा है जो भी रुपये का झोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.................... रुपइया हाय रूपया

भूख ही वो बदनसीब बला हैं

उनकी आँखों में काजल के जगह पानी रहा करता हैं 
हर लब तड़प से नजाने कितनी दफा आह भरता हैं 
जिन हाथो को किस्मत चमकानी वो जूते और कार चमकाते हैं 
कुछ बच्चे उसी चोराहैं पर भीख मांग कर खाना खाते हैं 
कितनो को तो मांगना भी नहीं आता बस कटोरा हिला देते हैं
इस कदर रोज वो मासूम अपना बचपन जला देते हैं
आखिर क्या हैं वो जिसने इनसे इनका बचपन छला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

उसी चोराहैं पर कुछ बच्चे बच्चो के खिलोने बेचा करते हैं
आते जाते बच्चो को देख बस यही सोचा करते हैं
कोई उनका हमउम्र ही जिदद करे और खरीदे खिलोने उनके
जिससे अपना पेट भरने को ला सके वो बस चंद तिनके
जिस उम्र में बच्चे अपने खिलोने लोगो को दिखने से डरा करते
और ये मासूम उसी उम्र में उन खिलोनो का सोदा करते हैं
ये केसी आग हैं जिसमे कितने मासूमो का बचपन जला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

चोराहैं से आगे तंग गलियों में नन्हे हाथो में चाकू या खंजर भी मिलेंगे
दर्द से तडपते लाचार बेबस और भी कितने ही मंजर मिलेंगे
वहां हर आंख एक निवाला देखने को भी तरसा करती हैं
अगर कभी मिल जाये हकीकत में खुशियों से बहुत बरसा करती हैं
पेट भर कर खाना इसी जुर्रत तो वो ख्वाब भी नहीं करते हैं
ओकात जानते हैं अपनी इसलिए वो कोई सवाल कोई जवाब नहीं करते
एक नन्हा सा कदम जिसकी वजह से इतना गुमराह होकर चला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वही बदनसीब बला हैं

आगे चलना वही हा थोड़ी दुरी पर कुछ झूठे पत्तल पड़े होंगे
थोडा नजर भी उठाना क्योकि उसके आस पास कुछ बच्चे खड़े होंगे
जो इस आस में वह टकटकी लगाये खड़े हैं कुछ तो मिल जायेगा
कल का कल देखेंगे कम से कम आज का काम तो चल जायेगा
इतने में वहा एक भूखा कुत्ता उन पत्तलो को चाटने लगता हैं
देखते ही देखते वो झूठन भी उसने बाटने लगता हैं
रात भर तडपाकर आखिर किसने उनकी नींदों को खला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

बचपन अच्छा था

इन टूटे दिलो से तो वो टूटे खिलोने अच्छे थे
इन बड़े बड़े महलो से वो छोटे छोटे कोने अच्छे थे
इन फरेबी मुस्कराहट से तो वो खिलखिलाना अच्छा था
अश्क छुपाने से वो चोट छुपाना अच्छा था
जिन्दगी की मार से वो बड़ो का मरना अच्छा था
आज की जीत से वो तब का हारना भी अच्छा था
इन जिम्मेदारियों के बोझ से तो वो बसते का वजन अच्छा थे
कुछ भी कहो यारोइस जवानी से वो बचपन अच्छा था


खुद कमाये हजारो से वो जिद्द का रूपया एक अच्छा था
जन्मदिन पर बड़ी बड़ी दावतो से वो दो रूपये का केक अच्छा था
नजरे चुराने से वो दुसरो का टिफिन चुराना अच्छा था
इस सन्नाटे से वो लाई ट जाने पर जो मचाया वो शोर मचानाअच्छा था

इतने व्यस्त रहने से वो वक्त की बर्बादी भी अच्छी थी
आज की खुली छूट से बंधन वाली आजादी अच्छी थी
इन मतलब के यारो से वो सच्चा दुश्मन भी अच्छा थे
कुछ भी कहो यारो इस जवानी से वो बचपन अच्छा था

दिखाने के लिए

कम हे इक सावन भी मेरा दर्द दिखाने के लिए
बस याद ही काफी हे तेरी तुझको भुलाने के लिए

क्यों बताते हो हाले- ऐ- दिल उस पगली का तुम मुझे
वो तिरछी निगाहे ही काफी हे मेरा दिल जलाने के लिए

सांस् भी भरता हु तो एक बोझ सा लगता मुझे
तू ही बता में क्या करू कर्ज तेरा चुकाने के लिए
हर कोई देखता हे रहम की नजरो से अब
काला चस्मा भी लगाया सब कुछ छुपाने के लिए
कम हे इक सावन भी मेरा दर्द दिखाने के लिए
बस याद ही काफी हे तेरी तुझको भुलाने के लिए

केसे हो सकता हे ?

कोई खंजर इश्क की निशानी केसे हो सकता हे ?
तेरे जाने के बाद मेरी नई कहानी केसे हो सकता हे?
और तुमने खुद ही तो तोडा हे रिश्ता मुझसे
अब तुम्हारी आँखों में पानी केसे हो सकता हे?

सब कुछ अपना इश्क में लुटा दिया मेने 
एक फ़क़ीर के जेब में रूपया खानदानी केसे हो सकता हे ?

दिलो को दिलो से मिलाता है जो इश्क करता हे इश्क कराता है वो..

दिलो को दिलो से मिलाता है जो
इश्क करता हे इश्क कराता है वो..

लिखता है कितनी ही वो अल्हड़ कहानी
कभी खुद है दीवाना कभी दुनिया दीवानी
कभी लिखता है सुखा वो गम के शहर में
कभी खुशियों के घर में छलकाता है पानी

बिना लफ्जो को सब समझाता है जो
इश्क करता है इश्क कराता है वो...

कभी शमा के लिए वो परवाना बने
कभी नफरत भुलाने का बहाना बने
भवरा वो बनकर कलियों की खिदमत करे
कभी राधा और मीरा का दीवाना बने

शास्त्र के नाम पर बंसी उठता है जो
इश्क करता है इश्क कराता है वो....

इश्क में तडपे खुद भी तडपाये हमे
अश्क पोंछे कभी तो कभी रुलाये हमे
नासमझ है हम जनता है वो सब
फिर जाने वो क्या क्या समझाता हमे

बेवजह ही हमे आजमाता है जो
इश्क करता है इश्क करता है वो...

याद आती हे

कही देखू कलि खिलते तुम्हारी याद आती है
कही दो पर अगर मिलते तुम्हारी याद आती है
तुम्हे जब याद करता हु तब नहीं आती लकिन
अगर देखू अश्क गिरते तुम्हारी याद आती है


जब भी में कभी सोया तुम्हारी याद आती है
अकेला पड के जब रोया तुम्हारी याद आती है
जब अपने साथ तब तो नहीं आती याद लकिन
अगर उस पल कही खोया तुम्हारी याद आती हे


कोई पूछे अगर हाल मेरा तुम्हारी याद आती है
जब ख्यालो ने हो घेरा तुम्हारी याद आती है
चलता रहू अगर यु ही नहीं आती याद लकिन
कही एक पल भी अगर ठहरा तुम्हारी याद आती है


जब जब भी दिल धडके ,तुम्हारी याद आती है
पलक बायी अगर फडके ,तुम्हारी याद आती है
बारिशो के मोसम नहीं आती याद लेकिन
अगर बिजली कही कड़के ,तुम्हारी याद आती है

बस अपने दिल की आवाज सुनो

जब घनघोर अँधेरा हो छाया
जब तडपे चंचल सी काया
जब राहे सब अनजानी हो
जब आँखों में बस पानी हो
जब साथ नो ये चाँद सितारे
जब मन अपना सब कुछ हारे
तब अपनी आँखों को मुन्दो
और अन्ध्यारे में भी प्रकाश चुनो
बस अपने मन की आवाज सुनो

जब का सुखे काजल
जब साथ न हो माँ का आंचल
जब सब हो जाये उथल पुथल
जब सांसो में न हो हल चल
जब सूनापन खाए जाये
जब दिल भी थोडा घबराये
तब बिन कुछ भी सोचे समझे
खुद का तुम विश्वास बनो
बस अपने दिल की आवाज सुनो

जब कुछ न तुम्हे दिखाई दे
कोई आहट भी न सुनाई दे
जब फूल से भी चुबते हो कांटे
जब कोई न सुख दुःख बाटे
जब कोई न थामे हाथ तुम्हारे
जब न हो तिनके का भी सहारा
उस पल खुद को दुनिया समझकर
अपना ही तुम हाथ चुनो
बस अपने मन की आवाज सुनो

जब राम नाम भी साथ न दे
जब कोई अपना हाथ न दे
जब ही घोपे खंजर
जब खुशिया हो जाये बंजर
जब सब कुछ हो जाये ख़त्म
जब परिस्थिया भी हो विषम
तब पिछला सब कुछ छोड़कर
तुम अपना नया आवास बुनो
बस अपने मन की आवाज सुनो

कभी कभी मेरा साया

कभी कभी मेरा साया मुझे खत में लिखकर भेजता है
की मेरा अपना ही मेरे जले पर अब रोटिया सेकता है
और मेने मसखरा लिबास पहना था दर्द छुपाने के लिये
अब हर कोइ मेरे दर्द को मसखरे अंदाज में देखता है
वो भी हस्ते है -2 और वो भी हस लेते है मेरे करतबो पर
बस में नहीं हस्ता यही एक गम मुझे बार बार कुरेदता है

खुद को क्या समझती है

कितनी मगरूर है वो , खुद को क्या समझती है
मेरे उड़ने के मंसूबो को, वो बस हवा समझती है
उसीके नाम से हीचकिया अभी बंद होती है
तो भला केसे वो खुद को मुझसे जुदा सम्झती हैं

उसे कहु पागल या कहु अभी नादानी बाकि है
हमने हाथ क्या जोड़े, वो खुद को खुद
समझती है

दोनों को ही वफा के मायने नहीं थे मालूम
फिर भी वो बस हमे ही बेवफा समझती है

मुस्कुराना मज़बूरी है

मुस्कुराते चेहरों को देख मुस्कुराना मज़बूरी है
अगर जिन्दा हो तो जिन्दा नजर आना जरुरी है
और साहब ये दुनिया है दुनिया आपको क्या पता
जो गले लगते है उनके दिलो में भी मिलो की दुरी है

और पीठ पीछे बनाते है सजिसे तख़्त पाने की
सामने सबके लबो पर दिखती बस जी हुजूरी है

जीत लिए तूने किले, राज्य ,मुल्क, तो क्या सिकंदर
एक दिल नहीं जीता तो तेरी जिन्दगी अधूरी है

तुम्हे शोक है ना दिल तोड़ने का ऐ जान
चलो तोड़ दो तुम्हारी खुशी में हमारी मंजूरी है

ऐतबार होता है

आँखों से देख कर भला कहा ऐतबार होता है
झूठ कहता है जो कहता ,सच में प्यार होता है 
खुदा के रहम पर जिन्दा रहोगे तुम भला कब तक
भूल बेठे हो किरायेदार तो किरायेदार होता है

तुम्हारे पास अगर है फकने के लिए टुकड़े 
जानवर तो क्या ,इंसान वफादार होता है

जब पत्ते भी हिलते हे खुदा के कहने पर
तो भला क्यों ये इंसान गुन्हेगार होता है....

तुम्हे आना होगा

मेरे दिल मेरी धड़कन मेरी पलकों 
सब कुछ सच सच बताना होगा
में जानता मैयत पर नहीं जरुरत तुम्हारी 
पर फिर भी तुम्हे आना होगा

क्योकि अधूरा है अभी कहानी में दर्द 
और लकिरो में अब भी है नाम तुम्हारा
क्योकि टूटे है सपने सिर्फ रात मे
और खुली पलकों में अभी पैगाम तुम्हारा
मिले मुझे मुक्ति बस इस खातिर
तुम्हे अपने अश्को से सजाना होगा
में जानता हु मैयत पर नहीं जरुरत तुम्हारी
पर फिर भी तुम्हे आना होगा

ना उन गरीबो की दुआओ का असर
ना वो मंदिर में बाँधी चुनर काम आई
ना टूटे तारो ने मेरी ख्वाहिसे सुनी
ना एक साथ बीते जो वो शाम आई
अब जो अधुरा सा कुछ रह गया
उसमे बस यादो को समाना होगा
में जानता हु नहीं मैयत पर जरुरत तुम्हारी
पर फिर भी तुम्हे आना होगा

अश्को से करना भले दोस्ती तुम
पर मुस्कराहट से भी न बेर रखना
आ जाये कोई कितना भी करीब
पर दिल से हमेसा उसे गैर रखना
मिलोगी मुझे जब अगले जन्म में
तो हर तरह मुझे ही अपनाना होगा
में जानता हु नहीं मैयत पर जरुरत तुम्हारी
पर फिर भी तुम्हे आना होगा

शाम आएगी...

हो सकता है जिन्दगी में एक रोज एसी शाम आएगी...
जिसने कभी तोडा था जाम वो लेकर मेरा जाम आएगी....
और हम भी मोहब्बत को बड़ी संजीदगी से लेते...
अगर इल्म होता कम्भख्त एक दिन जीने के काम आएगी....

और दरिया सा इश्क शायद ही कोई निभा सके....
जानते हुए समा लेता है लहर ,हमेसा होकर बदनाम आयेंगी.....

और शायद मौत से ज्यादा भरोसा तुझपर है मेरा
जनता हु मौत से पहेले तू लेकर आखरी सलाम आएगी.....

पूछती हैं

पहले जख्म देती है और फिर मेरे हालात पूछती हैं
वो लड़की शायद् पागल हें जो मुझसे हर बात पूछती हैं
जब तक भवर में थी मुझे ही मुकदर मानती थी कश्ती
जमीन पर क्या उतरी दरिया से उसकी औकात पूछती हैं

मेने भी गुमान में आकर उसको बेवफा कह दिया था
आखिर क्यों अब मेरी रूह मुझसे हर रात पूछती हैं

कोई नहीं देखता वालिद ने अपना सब कुछ दे दिया
दहेज कितना मिला हैं ये अक्सर पूरी बारात पूछती हैं

कुछ फिरते हैं मारे मारे चंद बूंदों की तलाश में
कुछ परिंदे ऐसे भी हैं जिनका पता बरसात पूछती हैं

जिसने कभी कदमो तले रोंद दिये थे जज्बात
वो अक्सर मेंरी कब्र पर आकार मेरे जज्बात पूछती हैं

क्या बनाया हैं मुझे....

हसना रोना क्या तूने बोलना तक सिखाया हैं मुझे....
ये सिर्फ में जानता हु तूने क्या से क्या बनाया हैं मुझे....
और उस शक्स से भला मोहब्बत केसे ना हो मुझे....
जिस शक्स ने मोहब्बत क्या हैं ये बताया हैं मुझे ....

और तू दिल पर मत लेना पागल है साली दुनिया....
जो बेवजह कहती रहती हे तूने पागल बनाया हैं मुझे.....

क्या गुनाह हैं....

तुम्हे देखकर चाँद भी अक्सर अपने दाग छुपाने लगता हैं......
सूरज की बात ही छोड़ो किरणों के पीछे जा शर्माने लगता हैं.....
फुलो ने भी तुमसे जलकर अब तो खिलना छोड़ दिया....
परवाने ने भी तुमहे देख समा में जलाना छोड़ दिया......
जिसके नूर पर में तो क्या खुद खुदा भी फनाह हैं....
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं....

जिसकी नीली आँखों से हर रोज सवेरा होता हैं......
जिसकी काली जुल्फों तले हर शाम अँधेरा होता हैं......
जिसकी मतवाली चाल देख मोर ने अपनी चाल बदल डाली हैं.....
जिसके मिठे बोलो ने कोयल की भी आवाज संभाली हैं....
जिसके नूर पर चाँद ये तारे सारे के सारे फनाह है...
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं.....

उसकी पायल की खनक हर साज से ज्यादा प्यारी हैं.....
उसके काजल ने खुद उसकी केसे नजर उतारी है.....
जब जब वो मुस्कुराती हैं तो हर साँस वही रुक जाती हैं.....
उसकी जिद्द के आगे पूरी दुनिया ये झुक जाती हैं.....
अब जिसके नूर पर इस जहा का हर शक्स फनाह हैं....
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं.....

अच्छी नही लगती

अब शादियो में सहनाई अच्छी नही लगती 
बेवजह जो चले वो पुरवाई अच्छी नही लगती

और लिखते लिखते जो तुझ् तक ना जा पाये
मुझे वो कलम वो रोशनाई अच्छी नहीं लगती

उस एक नजर का कुसूर हैं सारा का सारा
अम्मा बाबा अब मुझे पढाई अच्छी नही लगती हैं

मेरे दिल के दिल का हशर बहुत दर्दनाक था
मुझे मोहब्बत से मिली जुदाई अच्छी नहीं लगती

एक वक्त मेरा साया तेरी हिफाजत किया करता था
अब तुम नही तो मुझे मेरी परछाई अच्छी नहीं लगती

जब देखता हु तडपते लाचार भूख से मरते इंसान
तो मुझे खुदा तेरी ये खुदाई अच्छी नहीं लगती

अब में बड़ा हो गया हु अब तो फ़िक्र छोड़ दो माँ
मुझे तुम्हारे चेहरे की ये रुसवाई अच्छी नही लगती

जबसे देखा हैं तुझे अश्को के दरिया को पीते
मुझे समुन्द्र तेरी गहराई अच्छी नहीं लगती......

चिड़िया!!

चिड़िया!!

कहेने को तो चिड़िया ने अब पिंजरा अपना तोड़ दिया,
जाते -जाते रिश्ता अपना यादो के संग भी जोड़ दिया।
अब होकर भी आज़ाद वो चिड़िया आज़ाद न हो पाई है,
उंचे-उंचे बादल है पास और उसकी आँखों में रुसवाई हैं, 
हर पल वह अब भी पिंजरे की यादो में ही रहती हैं,
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

याद करती केसे उसको सब पिंजरे में छेड़ा करते थे,
केसे सब चीं- चीं-ची कह अपना प्यार उलेड़ा करते थे!!
केसे अम्मा शाम ढले उसको दाने डाला करती थी..
केसे बिन आईने के भी वो सजती और सवरती थी..
अब होकर आजाद भी वो खुदको आजाद न कहती हैं!
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

एक डाली पर उसने अब एक घर तो अपना बना दिया,
घास -फूस के कुछ तिनको से उसने अबतो सजा लिया!
उसका परिवार लेकिन अब भी पिंजरे वाले घर में बसता था,
शाम ढले उसकी आँखों में बस उस घर का ही रास्ता था ,
जहा वो होकर केद भी अक्सर नदिया के जेसे बहती हैं......
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

अब चिड़िया ने ठान लिया घर तो वापस जाना हैं,
जेसा भी था पिंजरा वो अब उसको ही अपनाना हैं......
उसके आने से अब खुशियों ने घर की हे देहलीज छुई,
देखो देखो एक चिडियों खुद ही पिंजरे में केद हुई......
और वो पिंजरे की घुटन भी हँसकर ही वो सहती हैं,
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

अंगार रहने दो....

भले तुम मशाल में जलते हुए अंगार रहने दो....
पर अब चिंगारियों में भी थोडा प्यार रहने दो.....

हर तरफ बस खून ही खून नजर आता हैं,
मेरे बच्चो के हाथ में भी हथियार रहने दो.......

दवा के नाम पर क्यों जहर खिलाते हो,
इससे अच्छा तो मुझे बीमार रहने दो...........

मेरा एक हाथ दुसरे हाथ का दुश्मन निकला,
अब मुझे तुम खुद से ही होशियार रहने दो.....

हमारा क्या हैं हमे जरुरत नहीं अदालत की,
कानून को तुम राजनीती का वफादार रहने दो......

गीने नहीं देती !

आस्तीन अक्सर सांप देती हैं, नगीने नहीं देती !
इन्सान को जज्बात रूह देती है,मशीने नहीं देती !

उसी रोटी का निवाला किसी को जीवन देता है ,
और वही रोटी नजाने कितनो को जीने नहीं देती !

जो खूंखार शेर के भी दांत गिनकर दिखा दे ,
ऐसे बबर शेर और कही की जमीने नहीं देती !

वही रंग, वही खून, तुम बिलकुल मेरे जेसे ही तो हो ,
पर ये राजनीति फिर भी सरहदों को सीने नहीं देती !

ये तुम्हारा कमीनापन तुमने खुद ही कमाया होगा,
वरना एक माँ अपने कुल को कमीने नहीं देती !

मैखाने में जाकर, में आज भी बेठता तो हु,
पर तेरी याद हैं साली कुछ और पिने नहीं देती !

four lines

झुके मस्तक झुकी पलकों को इबादत मान बेठे हो.....
उसने बनाई हैं साजिसे तुम शरारत मान बेठे हो.....
मोहब्बत का, नहीं मालूम , उसे एक हर्फ़ भी लकिन,
तमाशा -ऐ-नुमाइश को मोहब्बत मान बेठे हो......


नगीने को नहीं मालूम वो कितना खुबसूरत हैं....
चाँद तारो की जगह अब हमे तेरी जरुरत है......
झठ कहते हैं जो कहते तुम खुदा मूरत हो.......
उन्हें नहीं मालूम हे इतना खुदा तेरी ही मूरत हैं......


अरसा बीत गया अब सब सुच याद नहीं हो सकता .....
पर ये भी हकीकत हैं कोई तुम्हारे बाद नहीं हो सकता....
मुझे खुदा के बनाये यकीन पर इतना तो यकीन हैं....
मेने टूटकर किया था जो इश्क वो बर्बाद नहीं हों सकता.....


जो कहकर मुझे छोटा , दरिया सी हद बताते हैं....
उन्हें अक्सर कुछ तीनके भी उनका कद बताते हैं.....
और खुदा ने हम सबको बस एक बनाया था....
खीच जमीन पर लकीरे वो उन्हें सरहद बताते हैं....



न करना कुछ भी ऐसा , में मगरूर हो जाऊ....
खुद को खुदा मान बेठु नशे में चूर हो जाऊ......
अभी तो तुम ही हो जरुरत मेरी सांसो की .......
न हो एसा के में उन सांसो से भी दूर हो जाऊ....


तेरे नूर के सामने ये ताज तो बस धुल है
तुझसे इश्क ,गुन्हा है तो गुनाह कुबूल है
दिल से मत लगाना इस लोगो की बातो को
इनके लिए कल भी भूल थी आज भी भूल है 



भला कब तक रखोगे फूल तुम अपनी किताबो में
आज कह दो उन्हें जाकर तुम आती हो ख्वाबो में
जो पूछते है सवाल ,जवाब उनको ही मिलता है
नहीं मिलता उन्हें कुछ भी जो उलझते है जवाबो में


कहने को लहरों का रुख भी मोड़ देते है
पथरो के हवाले अपना दिल छोड देते है
पर अजब हें इन आशिको की आशिकी भी
इक दिल जोड़ने में कितनी कलि तोड़ देते है


चाँद अगर रात से दूर होने लगे
हर कोई राह में फिर खोने लगे
और ये नदिया समन्दर हो जाएँगी
जेसे तुम रोते अगर हम रोने लगे


चाँद बिन चांदनी तेरा एहसास क्या.....
जानकी भी जले तो फिर विश्वास क्या......
और तुम साथ थे सब यही था कही ......
अब जब तुम ही नहीं तो मेरे पास क्या ..


जो लोग इश्क में गिरकर संभल जाते है
वो लोग कुछ इस कदर बदल जाते है
देखते हे जब जब आसमान में नमी
पतंगे लेते है और उड़ाने निकल जाते है


आज तो कोई तुमपर फनाह होता हैं
कल का क्या हे पता कल क्या होता हैं
कोई खेल सकता हे किसी से तब तक ही तो
जब तक किसी में बाक़ी बचपना होता हे


गमो में भी मुस्कुराना कभी कम नहीं करते
कलंदर हे कुछ पाने या खोने का गम नहीं करते
मिटा सकते हो तो मिटा देना वजूद हमारा
पर हवाओ से चिरागओ की हिफाजत हम नहीं करते


तुमने भरी भीड़ में हाथ छोड़ा पर खोये हम नहीं 
तन्हा थे घबराना लाजमी था पर रोये हम नहीं 
तुमने यही सोचा होगा खवाबो में आकार सतोगी मुझे
कफ़न में लिपटी रही लाश मेरी पर देखो सोये हम नहीं



हमारी मुलाकातों का कुछ इस कदर सिला देना।

हमारी मुलाकातों का कुछ इस कदर सिला देना।
हम नजर आये अगर हाथ हवा में हिला देना।।
जब गहराई हो जाये ,मेरे ख्यालो से गहरी,
तब साहिल से या किसी तिनके से मिला देना।।

और भूक तेरी हो या मेरी ,क्या फर्क पड़ता हैं,
बस जहा मिले तुमको दो निवाले खिला देना।।

मुझे मिलने नहीं देते ,वरना में खुद ही पिला देता,
तुम्हे मिले अगर ये राजनीती ,तो इसे जहर पिला देना।।

#क्या_सच_में_अच्छे_दिन_आने_वाले_हैं

#क्या_सच_में_अच्छे_दिन_आने_वाले_हैं

क्या बूढ़े बूढ़े कंधो पर अब बोझ खत्म होने वाला हैं ?
क्या महगाई का दानव सर पकड़ रोने वाला हैं ?
क्या नन्हे नन्हे हाथो में अब किताबे आने वाली हैं?
क्या अब माँ भी पेट भरकर खाना खाने वाली हैं?
क्या ये लोग अब हमारे ख्वाब बचाने वाले हैं?
माँ बतलाओ ना क्या सच में अच्छे दिन आने वाले है?

क्या अब बहन मेरी अकेले कालेज जा पाएगी?
क्या अब बाबा की फसले सच में लहरायेंगी?
क्या अब नुकड़ पर वो लड़का भीख नहीं मांगेगा?
क्या वो सरकारी बाबु अब बिन रिशवत ही मानेगा?
क्या सच में अब ये लोग हमे नए ख्वाब दिखाने वाले?
माँ बतलाओ ना क्या सच में अच्छे दिन आने वाले हैं?

क्या पढ़ लिखकर अब लोगो को रोजगार मिल जायेगा?
क्या साठ साल से दुबा सूरज अब फिर खिल जायेगा?
क्या मेरा रुपया अब डालर को आँख दिखाएगा?
क्या देश मेरा सब देशो के कदम से कदम मिलाएगा?
क्या सच में अब ये झूठे अपनी बात निभाने वाले हैं?
माँ बतलाओ ना क्या सच में अच्छे दिन आने वाले हैं?

चलो किसी के हमदर्द बने और दर्द का बटवारा करे......

कभी खुद रूककर वक्त को गुजरते देखना
किसी की ख्वाहिसो को मरते देखना
वो पल भी तुम्हे दर्द से चीखता नजर आएगा
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा एक पल में उतर जाएगा
ऐसे ही दर्द से चलो 
अब हम किनारा करे......
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे......

मिलंगे तुम्हे चोराहो पर छोटू ,बड़े बड़े काम करते
कभी पेट के लिए कभी खुददारी के लिए मरते
तुम थोडा सा गिला कर आगे निकल जाते हो
दर्द होता हैं उस पल तुम्हे पर फिर बदल जाते हो
क्यों ना आज से उस
बचपन को सवारा करे.....
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे......

तपते हए रागिस्तान को कुछ बुँदे भी सुकून देती हैं
जब कोई हार जाता हैं तब हार ,जीत का जूनून देती हैं
छट जाती हैं काली घटाए,नाजुक हवा के झोको से।
उजाला दबे पाव आता हैं,छोटे-छोटे झरोको से।
वेसे ही हम भी छोटी छोटी
खुशियों से गुजारा करे.....
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे.....

जेसे डाली नहीं मुरझाती हैं एक फूल के टूट जाने पर
जेसे सफर नही खत्म होता एक सवारी के छुट जाने पर
और कब तक पुराने दर्द को यु बार बार कुरेदते रहे
और क्यों हम इस फरेब को पाक मोहब्बत कहे
क्यों न हम भी किसी से
अब इश्क दोबारा करे......
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे.......

दर्द वही पर पड़ा छोड़ दिया मेने ……

दर्द वही पर पड़ा
छोड़ दिया मेने ……

हाँ हाँ वही पर
जहा कभी कागज ने कलम को छुआ था।
जहा दर्द और इश्क का संगम हुआ था।
जहा से खीची गई थी लकीर।
जहा सो गया था हमारा जमीर।
जहा तडप रहा था एक दिल,
जिसे बड़ी बेरहमी से तोड़ दिया मेने,
दर्दे वही पर ......हाँ वही पर पड़ा
छोड़ दिया मेने……

साथ ले जा कर भी अब में क्या करता ।
वो रोज नए नए और ज्यादा दर्द से गुजरता।
और फिर हो सकता हैं तुम्हे बुरा भला कहता।
खता उसकी भी नही वो कब तक चुप रहता ।
इसलिए उसका रिश्ता अकेलेपन से जोड़ दिया मेने,
दर्द वही पर…… हाँ वही पर
पड़ा छोड़ दिया मेनें……..

अब वहा जाना कभी तो संभल कर जाना।
और हो सके थोडा सा बदल कर जाना।
क्योकि जनता हैं वो दर्द ,तुम्हारा नाम।
फिर चीखने लगा तो कर देगा बदनाम
अब अश्क तो बाकि नहीं होंगे उसमे,
क्योकि उसे पूरी तरह से निचोड़ दिया मेने,
दर्द वही पर .....हां वही पर
पड़ा छोड़ दिया मेने……..