Monday, 14 July 2014

चिड़िया!!

चिड़िया!!

कहेने को तो चिड़िया ने अब पिंजरा अपना तोड़ दिया,
जाते -जाते रिश्ता अपना यादो के संग भी जोड़ दिया।
अब होकर भी आज़ाद वो चिड़िया आज़ाद न हो पाई है,
उंचे-उंचे बादल है पास और उसकी आँखों में रुसवाई हैं, 
हर पल वह अब भी पिंजरे की यादो में ही रहती हैं,
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

याद करती केसे उसको सब पिंजरे में छेड़ा करते थे,
केसे सब चीं- चीं-ची कह अपना प्यार उलेड़ा करते थे!!
केसे अम्मा शाम ढले उसको दाने डाला करती थी..
केसे बिन आईने के भी वो सजती और सवरती थी..
अब होकर आजाद भी वो खुदको आजाद न कहती हैं!
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

एक डाली पर उसने अब एक घर तो अपना बना दिया,
घास -फूस के कुछ तिनको से उसने अबतो सजा लिया!
उसका परिवार लेकिन अब भी पिंजरे वाले घर में बसता था,
शाम ढले उसकी आँखों में बस उस घर का ही रास्ता था ,
जहा वो होकर केद भी अक्सर नदिया के जेसे बहती हैं......
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

अब चिड़िया ने ठान लिया घर तो वापस जाना हैं,
जेसा भी था पिंजरा वो अब उसको ही अपनाना हैं......
उसके आने से अब खुशियों ने घर की हे देहलीज छुई,
देखो देखो एक चिडियों खुद ही पिंजरे में केद हुई......
और वो पिंजरे की घुटन भी हँसकर ही वो सहती हैं,
और ये सारी दुनिया उसको पागल चिड़िया कहती हैं!!

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