Monday, 14 July 2014

क्या गुनाह हैं....

तुम्हे देखकर चाँद भी अक्सर अपने दाग छुपाने लगता हैं......
सूरज की बात ही छोड़ो किरणों के पीछे जा शर्माने लगता हैं.....
फुलो ने भी तुमसे जलकर अब तो खिलना छोड़ दिया....
परवाने ने भी तुमहे देख समा में जलाना छोड़ दिया......
जिसके नूर पर में तो क्या खुद खुदा भी फनाह हैं....
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं....

जिसकी नीली आँखों से हर रोज सवेरा होता हैं......
जिसकी काली जुल्फों तले हर शाम अँधेरा होता हैं......
जिसकी मतवाली चाल देख मोर ने अपनी चाल बदल डाली हैं.....
जिसके मिठे बोलो ने कोयल की भी आवाज संभाली हैं....
जिसके नूर पर चाँद ये तारे सारे के सारे फनाह है...
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं.....

उसकी पायल की खनक हर साज से ज्यादा प्यारी हैं.....
उसके काजल ने खुद उसकी केसे नजर उतारी है.....
जब जब वो मुस्कुराती हैं तो हर साँस वही रुक जाती हैं.....
उसकी जिद्द के आगे पूरी दुनिया ये झुक जाती हैं.....
अब जिसके नूर पर इस जहा का हर शक्स फनाह हैं....
अगर उससे मुझे इश्क हुआ तो क्या गुनाह हैं.....

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