Monday, 14 July 2014

रुपइया हाय रूपया

चलो तुम्हे समझता हु में क्या हे रूपये का मोल 
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल 
रूपइया हाय रूपया ........रुपइया हाय रूपया
भाई भाई का बहुत हुआ अब माँ बेटे का बटवारा हैं 
ममता भी अब लगी है बिकने ये बेटा कितना बेचारा है 
भाई के खाली हाथ देखकर बहन ने राखी है तोड़ी
हर रिश्ता बिखरा ऐसे जेसे बिखरी हो कोडी
चन्द रुपियो के चक्कर में खुलती रिस्तो की पोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.............. रुपइया हाय रूपया
जिसकी जेब हो हरी भरी वो लगता थानेदार यहा
जिसकी जेब कुछ ना खनके उसका जीना बेकार यहा
रात दिन बस गिनते जाए ऐसे ही सबके सपने हे
कागज पर हे छपे जो बापू बस वो बापू अपने हे
क्यों पूजे गाँधी को दुनिया ये बात बड़ी अनमोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ..............रुपइया हाय रूपया
एक के बदले दो मिल जाये हमको तो नींद नहीं आती
कल का सूरज कल देखेंगे आज की चिंता हे खाती
रूपये की माया तो बस ये रूपये वाले ही जाने हे
गरीब के मुह तो ना लग पाते चैन से दो भी दाने हे
कब तक ऐसे सहते जाये खुदा अब तो आंखे खोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया ...........रुपइया हाय रूपया
रोज रोज ये गिरकर भी देखो अपने दाम बढाता हे
स्वीज बैंक बेठा बेठा हमपर हुकुम चलता हे
इसकी क्या ओकात अगर हम इसको भाव नहीं देंगे
इस रूपये चक्कर में हम अपनो को घाव नहीं देंगे
फिर खुद ही सुलझेगा है जो भी रुपये का झोल
जितना जोर से बोल जाये उतना जोर से बोल
रूपइया हाय रूपया.................... रुपइया हाय रूपया

No comments: