Monday, 14 July 2014

चलो किसी के हमदर्द बने और दर्द का बटवारा करे......

कभी खुद रूककर वक्त को गुजरते देखना
किसी की ख्वाहिसो को मरते देखना
वो पल भी तुम्हे दर्द से चीखता नजर आएगा
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा एक पल में उतर जाएगा
ऐसे ही दर्द से चलो 
अब हम किनारा करे......
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे......

मिलंगे तुम्हे चोराहो पर छोटू ,बड़े बड़े काम करते
कभी पेट के लिए कभी खुददारी के लिए मरते
तुम थोडा सा गिला कर आगे निकल जाते हो
दर्द होता हैं उस पल तुम्हे पर फिर बदल जाते हो
क्यों ना आज से उस
बचपन को सवारा करे.....
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे......

तपते हए रागिस्तान को कुछ बुँदे भी सुकून देती हैं
जब कोई हार जाता हैं तब हार ,जीत का जूनून देती हैं
छट जाती हैं काली घटाए,नाजुक हवा के झोको से।
उजाला दबे पाव आता हैं,छोटे-छोटे झरोको से।
वेसे ही हम भी छोटी छोटी
खुशियों से गुजारा करे.....
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे.....

जेसे डाली नहीं मुरझाती हैं एक फूल के टूट जाने पर
जेसे सफर नही खत्म होता एक सवारी के छुट जाने पर
और कब तक पुराने दर्द को यु बार बार कुरेदते रहे
और क्यों हम इस फरेब को पाक मोहब्बत कहे
क्यों न हम भी किसी से
अब इश्क दोबारा करे......
चलो किसी के हमदर्द बने
और दर्द का बटवारा करे.......

No comments: