हमने तो सोचा था की
बस हमारी पीर पुरानी हैं.....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं....
सबके तकिये हैं भीगे
सबने ही कुछ छुपाया हैं.....
सबको ही इस इश्क ने
कभी ना कभी रुलाया हैं.....
छोटेपन के अश्क लिए
सब ही बड़े हो जाते हैं....
फिर खुद से छोटो को
अपने किस्से सुनते हैं.....
जो समझाते हैं मुझको
खुद भी कर बेठे नादानी हैं....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं....
हर साहिल को लहरों ने
आखिर में जाकर छोडा हैं.....
हर फूल को डाली से
किसी ना किसी ने तोडा हैं.....
कभी रावण बनकर कोई
सीता को ले जाता हैं....
कभी कान्हा हार कर
बिन राधा बंसी बजाता हैं....
आखिर में सबको ही
पड़ती अपनी पीर छुपानी हैं....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं...
बस हमारी पीर पुरानी हैं.....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं....
सबके तकिये हैं भीगे
सबने ही कुछ छुपाया हैं.....
सबको ही इस इश्क ने
कभी ना कभी रुलाया हैं.....
छोटेपन के अश्क लिए
सब ही बड़े हो जाते हैं....
फिर खुद से छोटो को
अपने किस्से सुनते हैं.....
जो समझाते हैं मुझको
खुद भी कर बेठे नादानी हैं....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं....
हर साहिल को लहरों ने
आखिर में जाकर छोडा हैं.....
हर फूल को डाली से
किसी ना किसी ने तोडा हैं.....
कभी रावण बनकर कोई
सीता को ले जाता हैं....
कभी कान्हा हार कर
बिन राधा बंसी बजाता हैं....
आखिर में सबको ही
पड़ती अपनी पीर छुपानी हैं....
हमदर्द बनकर पता चला
हर घर में अमर कहानी हैं...
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