Sunday, 30 September 2012

आखिर हम क्यों नही भाप पाते आने वाले तूफान को


आखिर हम क्यों नही भाप पाते आने वाले तूफान को
खुदा कुछ तो सहन शक्ति दी होती इस इंसान को
कल तक जो बस मेरी शिकंद पर जहा से बेर रखता था 
आज नहीं पहचान पता मेरी दर्द भरी मुस्कान को

में बहुत रोया तडपा और बहुत कररहा था उस पल
पर मेरे जीने मेरे मरने में आखिर क्या लेना इस जहान को  

ईट पत्थर और सीमेंट से नहीं मेहनत और सिद्ददत से बनाया था 
तोड़ दिया तेरे चंद कडवे बोलो ने जिस माकन को 

अब तो अपने भी परायो जेसा बर्ताव करने लगे हे 
कम से कम कुछ तो लहजा सिखा इस जुबान को 

इस संसार में खरीद्द्दर तो हर चोराहे पर मिलेगा 
पर तू मेट बेक चाँद खोते सिक्को में इस इमान को 

दिल तोड़ दिया अब दिलासा देने के लिए भी ना रुक 
क्योकि में खुद ही खा देख पाउँगा आने वाले उफान को 

सब तेरे पास बड़ी उम्मीद लेकर आते हे  अगर झूठा हे
 उनका भरोसा तो बंद कर ले अपनी इस दुकान को  

अथिथि देवो भव का पाठ बच्चो को सिखाते रहे मगर 
चार दिन से ज्यादा नही झेल पाए उस मेहमान को 


और तुम्हारे गोरख धंदो का जो बेवजह शिकार हो गया 
एक माँ छाती से लगाकर पला था उस जवान को 

और धरती की खुसी के लिए अश्क बहाया करता हे असमान 
वरना हमसे क्या लेना हे उस असमान को 

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