Friday, 27 July 2012

पागलो के सिवा बेवजह अब मुस्कुराता कोंन हे ?



पागलो के सिवा बेवजह अब मुस्कुराता कोंन हे ?
गेरो के दर्दो में अपनी पलके भीगता कोंन हे ?
गम किसी काँधे सर रख रोने से कम होता हे 
पर बिन जान पहचान अब गले से लगता कोंन हे ?

फिसलने की उम्र में , में भी फिसला आखिर क्या करता 
अब हाथ की ऊँगली पकड़ चलना सिखाता कोंन हे ?

बचपन में रेत के बहुत आशियाने बनाया करता था में 
अब सपनो में भी रेत के घर बनाता कोंन हे ?

शर्म लिहाज तो गहेने थे मेरे देश के
पर अब बड़ो के आगे भी अब शर्माता कोंन हे ?

अपने बुजुर्गो के आखिर केसे शर्म करेंगे लोग 
खुदा के सामने भी अब नजरे झुकता कोंन हे ?

नशे में धुत रहने के लिए मेंखाने जाने की झेहमत उठानी पड़ती हे 
आखिर अब नजरो से जाम पिलाता कोंन हे ?



सात जन्मो का तो वादा कर लिया करते हे लोग
पर एक जन्म भी मरते दम तक साथ निभाता कोन हे ?

सबने की बेकद्री मेरी तुने मुझको समझा
तेरे सिवा इस जहा में और मुझको चाहता कोंन हे ?

जरुरत नहीं गंगा स्नान की गली की कीचड़ काफी हे
पर आखिर अब सच्चे मन से नहाता कोंन हे ?

आशिक तो बहुत सच्चे हे आज भी लेकिन 
आखिर उनकी आशिकी को अब अजमाता कोंन हे ?

क्यों कह रहे हो तुम मुझको बेहया 
आखिर अब अपनी आबरू बचाता कोंन हे ?

दुसरो से इतने सवाल करने की हिम्मत की मेने भी
पर खुद से खुद ये सवाल पूछ पाता कोंन हे ?

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