Wednesday, 25 July 2012

बेसक जिन्दगी की हर जद्दो जहेद से गुजर के आ



बेसक जिन्दगी की हर जद्दो जहेद से गुजर के 
पर घर से जब भी निकल अश्क पोछ और सवंर के 

आफताब को पश्चिम में डूबे बहुत वक्त हुआ
  चाँद शर्म कर अब तो बदलो  से उभर के 

बहुत साल होस में रहा तू मेखाने में रहकर भी
कम से कम अब तो खुद को बेहोश कर के 

जिन्दगी में हार जीत के कुछ मायने नहीं होते
बस जिन्दगी की  हर जंग तू नियत से लड़कर के 

मोत तू तुझे छुने से पहले हजार बार सोच लेगी
बस तू एक बार मोत की आँखों में आंखे डाल कर के 

कहा चले गए वो परिंदा जो कल तक मेरे हुआ करते थे
अगर आज भी हे मेरा तो में पास लोट कर के आ

लगता हे मेरी तहरीर अब तेरी समझ से बाहर हे
जा कही से माथे की सिकंद पड़ना समझ कर के 

बहुत साल उस चोराहे पर तेरा इंतजार किया मेने
मुझसे मिलना हे तो वही मेरा इंतजार कर के

शायद मेरी किस्मत लिखते वक्त कलम ने दम तोड़ दिया
जा कही से उस कलम में इख्लाश भर कर के आ

यु तो मेरी जिन्दगी एक खुली किताब के माफिक हे
लकिन तू उन कोरे पन्नो को दिल से पड़ कर के आ

तुझे क्या लगा तेरे दिए जख्म यु ही भुला दूंगा
नहीं पहले मेरे आसुओ का  समंदर पर कर के आ

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