Saturday, 18 January 2014

भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं


उनकी आँखों में काजल के जगह पानी रहा करता हैं
हर लब तड़प से नजाने कितनी दफा आह भरता हैं
जिन हाथो को किस्मत चमकानी वो जूते और कार चमकाते हैं
कुछ बच्चे उसी चोराहैं पर भीख मांग कर खाना खाते हैं
कितनो को तो मांगना भी नहीं आता बस कटोरा हिला देते हैं 
इस कदर रोज वो मासूम अपना बचपन जला देते हैं
आखिर क्या हैं वो जिसने इनसे इनका बचपन छला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

उसी चोराहैं पर कुछ बच्चे बच्चो के खिलोने बेचा करते हैं
आते जाते बच्चो को देख बस यही सोचा करते हैं
कोई उनका हमउम्र ही जिदद करे और खरीदे खिलोने उनके
जिससे अपना पेट भरने को ला सके वो बस चंद तिनके
जिस उम्र में बच्चे अपने खिलोने लोगो को दिखने से डरा करते
और ये मासूम उसी उम्र में उन खिलोनो का सोदा करते हैं
ये केसी आग हैं जिसमे कितने मासूमो का बचपन जला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

चोराहैं से आगे तंग गलियों में नन्हे हाथो में चाकू या खंजर भी मिलेंगे
दर्द से तडपते लाचार बेबस और भी कितने ही मंजर मिलेंगे
वहां हर आंख एक निवाला देखने को भी तरसा करती हैं
अगर कभी मिल जाये हकीकत में खुशियों से बहुत बरसा करती हैं
पेट भर कर खाना इसी जुर्रत तो वो ख्वाब भी नहीं करते हैं
ओकात जानते हैं अपनी इसलिए वो कोई सवाल कोई जवाब नहीं करते
एक नन्हा सा कदम जिसकी वजह से इतना गुमराह होकर चला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वही बदनसीब बला हैं

आगे चलना वही हा थोड़ी दुरी पर कुछ झूठे पत्तल पड़े होंगे
थोडा नजर भी उठाना क्योकि उसके आस पास कुछ बच्चे खड़े होंगे
जो इस आस में वह टकटकी लगाये खड़े हैं कुछ तो मिल जायेगा
कल का कल देखेंगे कम से कम आज का काम तो चल जायेगा
इतने में वहा एक भूखा कुत्ता उन पत्तलो को चाटने लगता हैं
देखते ही देखते वो झूठन भी उसने बाटने लगता हैं
रात भर तडपाकर आखिर किसने उनकी नींदों को खला हैं
भूख जी जनाब सही सुना भूख ही वो बदनसीब बला हैं

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