Friday, 9 August 2013

मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर
तेरे दिल बसेरा मुझे चाहिए क्या करोगी तुम मेरा पता जानकार
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर

कभी देखा हे मछली को बिना नीर के कुछ वेसे ही तडपता हु तुम्हारे बिना
कभी रखा हे पलकों को कुछ पल जुदा कुछ वेसे ही तड़पता हु तुम्हारे बिना
एक एक लम्हा बिताया मेने तुम्हारे बिना अपनी सजा मानकर
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर

अगर होता मोह्हबत का निसान ताज तो में वो भी बनता तुम्हारे लिए
रहकर जो तुमसे जुदा लिखता साज तो में वो भी बजाता तुम्हारे लिए
जी रहा हु में होकर के तुमसे जुदा जेसे सांसो को खुदसे जुदा मानकर
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर

रात भर ख्वाब भी मेरे रोते रहे मेने पलकों में ना अनके उनको दिया
भुला अपना सारा चेन -ओ -सुकून कब था जाने तुमको दिया
सब कुछ हे खोया मेने इश्क में मगर तुमको पाया हे मेने नफा मानकर
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर

चाँद का जो रिश्ता लहरों से हे मेरा भी हे तुमसे कुछ इसकदर
तुम्हारे ख्वाबो की आहट भी करती तुमको क्या पता कितना बेसबर
तुम्हारे हर एक नाज नखरे नखरे सहता हु तुम्हरी अदा मानकर
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर

मेरे लफ्जो में तेरा ही जिक्र हुआ बस तुमने ही कभी जाना नहीं
मेरे अश्को पर रोता जमाना रहा तूने उनको भी अपना माना नहीं
जब सुनोगी कभी होगा तुमको एक एक हर्फ़ लिखा तुम्हारी वफ़ा मानकर
मेने चाहा तुम्हे खुदा मानकर तुम बस चाहो मुझे एक खता मानकर



......pavan

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