Friday, 9 August 2013

मेरा यार उंगलियों में उंगलिया डाल चलने से मुकर जाता हे
अकेला ही जाता हे जहा जाता हे क्या इल्म किधर जाता हे 
में उसकी यादो को जलाता हु सर्द हवाओ की खातिर
फिर अपनी ही आँखों से उसपर पानी बिखर जाता हे

अधजली यादो की राख की सेक मुझे सुला देती ह
पर ख्वाब टूट जाते जब ये महताब गुजर जाता हे

जब भी होश मिला खुद को मखाने में पाया मेने
तन्हा रहने पर हर किस्म का नशा उतर जाता हे

तुमने जाते वक्त कहा था मुझसे कुछ बनकर दिखाना
अश्को के दरिया में डूबकर आखिर कोन उभर पता हे

कुछ ज्यादा ही सिद्दत दिखा दी मेने तेरी चाह में
तभी मुझे मेरे जनाजे में हर तरफ तेरा कन्धा नजर आता हे

फिर जन्म लूँगा खुद को तेरे मुताबिक बना लूँगा
सुना हे सजा-ए-मोत पाकर हर गुन्हेगार सुधर जाता हे

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