Friday, 9 August 2013

एक लम्हे में अगर वो सारे लम्हे भुलाना आसन होता 
तो मेरे अन्दर बस्ता कोई खुदा नहीं एक शेतान होता 
और मुझ जेसा पत्थर क्या चाहता तुम जेसे राही से
कदमो से ठोकर मारता ही सही पर एक कदरदान होता 

कभी उस राह कदम ना रखता जहा तिजारत हो मोह्हबत की
दिल भी टूट जाते हे अगर मुझे इस बात का ज्ञान होता

तूने हाथ थामकर छोड़ दिया कोई शिकायत नहीं
बस उस लम्हे आँखों में नमी होती तो मुझपर एहसान होता

तेरी सदा यही मन्नत थी तुझे मिले एक महल ताज सा
मेरी चाहत थी मिले तेरे साथ चाहे नसीब रेत का मकान होता

में हिफाजत करता तेरी ऐ लो एक दीया बनकर
चाहे तुझसे रोशन करने में मेरा हर करता कुर्बान होता 

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