
तलाश इश्क की कर रहा इस जहान में हो गया में गुम कही खुद की पहचान में
Monday, 26 December 2011

याद आता हे वो बचपन पुराना
सेतानी कर एक कोने में छिप जाना
फिर पापा का मुझे वो दुन्ड़ते रह जाना
मिल जाने पर मेरा वो मार खाना
याद आता हे वो बचपन पुराना
उस मार पर माँ का वो सहलाना
और रोते रोते मेरा भूखे ही सो जाना
मेरे सोने पर पापा का मुझे जगाना
याद आता हे वो बचपन पुराना
मेरा अपनी हर जिद को पूरा करवाना
ना पूरी होने पर दिन भर कुछ ना खाना
फिर श्याम को वो माँ का मुझे समझाना
याद आता हे वो बचपन पुराना
पापा के इंतजार में जागते जागते
सो जाना
उनका मेरे
लिए रोज कुछ ना कुछ लाना
मुझे सोता
देख मेरे सर पर हाथ फेह्राना
याद आता
हे वो बचपन पुराना
वो मेरा
स्कूल ना जने के भने बनाना
कभी पेट
तो कभी सर दर्द की आड में छूटी कर जाना
वक्त निकलने
पर झट से उठ जाना
याद आता
हे वो बचपन पुराना
वो मेरी
बहन से रूठना मानना
कभी उसका
तो कभी मेरा लड़ाई में मर खाना
हमारी लड़ाई
में वो माँ का जग जाना
हर रोज
दिन भर बस खेलते रह जाना
कभी जीत
तो कभी हार भी जाना
फिर श्याम
को छुपकर मेरा घर में आना
याद आता
हे वो बचपन पुराना
कभी मेरा
किसी आफत में ना पद्पना
जिन्दगी
को मेरे द्वारा एक खेल समझे जाना
हस्ते गाते
हर दिन का गुजर जाना
याद आता
हे वो बचपन पुराना
वो छुट्टियों
में मेरा हर बार गाव जाना
दादी का
मुझको वो कहानिया सुनना
कभी कभी
किसी कहानी का दिल में घर कर जाना
वो मेरा
हमेसा नादाँ समझे जाना
सब कुछ
समझकर मेरा कुछ ना कह पाना
बीच में
बोलने पर मेरा डाट खाना
याद आता
हे वो बचपन पुराना
हस्ते हस्ते
ही आँखों में अंशु आ जाना
सोचते सोचते
हर याद का ताजा हो जाना
अच्चइयो
के साथ साथ बुरइयो का भी याद आना
शयद इसी
लिए याद आता हे वो बचपन पुराना
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