एक नन्ही सी चिड़िया अपना पिंजरा छोड़ कर चली
क्यों हे वो अपना नाता हमसे तोड़ कर चली
एक नन्ही सी चिड़िया अपना पिंजरा छोड़ कर चली
उसका ही था नाम हर पल उनकी जुबान पर
मरते थे उसके रोने पर जीते थे मुस्कान पर
दिल धड़कन सब ही चुप हे ये आंखे बोलती हे
जाने क्यों
बह बह कर सारे राज खोलती हे
गम हे उसके जाने का पर रीत निभानी हे
सिकायत हे खुदा से हर बेटी क्यों परायी हो जानी हे
अपना नाता क्यों हे वो गेरो से जोड़ कर चली
एक नन्ही सी चिड़िया अपना पिंजरा छोड़ कर चली
सबसे ज्यादा रोती हे वो जो उसकी सहेली थी
अपने मुह से पहला अक्षर माँ ही बोली थी
नो महा तक उसने उसकी पीढ़ा को झेला हे
हे भगवन क्यों तुने उसके संग ये खेल खेला हे
और अब किसको वो अपने दिल की हर बात बताएगी
विदा करने पर उसको उसके बेटी होने पर पछताएगी
आज हे वो उसकी लाल चुनर ओड कर चली
एक नन्ही सी चिड़िया अपना पिंजरा छोड़ कर चली
अब जाकर तू वह किसको यु आंख दिखेगी
मेरे ना लड़ने पर भी तू आंशु बहाएगी
साथ मेरे खेले थी तू खेल बहुत ही सारे
कभी तू हरा करती थी कभी हम भी थे हरे
हे राखी मेरा करेगी बेसबरी से इंतजार
में आऊंगा तेरे घर लेकर माँ का प्यार
क्यों तो दाना पानी इस घर से छोड़ कर चली
एक नन्ही सी चिड़िया अपना पिंजरा छोड़ कर चली

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