
आखिर क्यों
क्यों किसी बोझ के तले अपनी जान देता हे
हक़ नहीं हे उन्हें क्यों फिर उनका बलिदान लेता हे
क्या इंकार नहीं कर सकता हे ये भगवन
या खुद ही प्यारी हे इसे इनकी जान
खेतो में पड़ा हल जाने कब कंधे तक आ गया
कुए में पड़ा रस्सा जाने कब फंदे तक आ गया
क्या ये गरीब बस मर गया यु
आखिर क्यों
क्यों मरते वकत उसने आँखों में पट्टी बांध ली
क्यों उसने अपनी जान इतनी सस्ती जान ली
क्यों उसे ख्याल न आया अपने परिवार का
अपने कर्तव्य और अपने अधिकार का
आंखे बंद वो हो रही हे वो अंशु कही और आ रहे हे
मरते मरते भी वो उनको दुआए डेट जा रहे हे
पर क्या तुम्हारे बिन वो रह पायगे यु
आखिर क्यों
आखिर कब तक आंखे मूंदे इन हत्यारों को यु ही देखते रहे
अपनी गलतियों को उन बेचारो पर देखते रहे
उनका अब जीना हराम हो चूका था
जीने से मरना आसन हो चूका था
रहा वही पकड़ी जो समझ आ रही थी उन्हें
जो अपनी और फुसला रही थी उन्हें
वो मारकर भी न मर पायगे यु
आखिर क्यों
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