तलाश इश्क की कर रहा इस जहान में हो गया में गुम कही खुद की पहचान में
Monday, 26 December 2011
मेरे एक दोस्त ने मुझसे पूछा के क्या हे ये बुधवार
मेने कहा नहीं जनता ज्यादा पर हे बड़ा खुन्कार
कभी मेरे दोस्त तो कभी दुस्मानो की जान लेता हे
क्या हे हक़ उन्हें जो उनकी सासे मांग लेता हे
नजाने ये हे कसब की जयंती या लादेन का अंतिम वार
पता नहीं मेरे दोस्त आखिर क्या हे ये बुधवार
जाने कितने सालो से ये हमपर
भारी पड़ता आया हे
इसने हमारे
देश में बहुत आतंक फेलाया हे
जान हम
उन आंतकियो की समझते रहे अनमोल
जाने हे
ये रहू का दिन या केतु का साक्षात्कार
पता नहीं मेरे दोस्त आखिर क्या हे ये बुधवार
लाखो को खून के आंशु रुलाया
इसने
जाने कितनो
को यतीम कराया इसने
बहुत का
तो इस जहा में कोई रहा ही नहीं
शयद इन
दरिंदो ने ये दर्द कभी सहा ही नहीं
जाने उनकी
खुसी हे ये सिर्फ हे उनका व्यापर
सरकारे
भी हमारी कुछ भी ना कर पाई हे
अपनी जन
तो बचा ली पर हमारी ना बचा पाई हे
सोते रहे
संसद में और लड़ते रहे खुद से ही
शांति के
नाम पर डरते रहे युद्ध से भी
वो बस मचाते
रहे यु ही हाहाकार
कुछ को
पकड़ा तो हायजेक में छोड़ दिया
छुट कर
उन्होंने कही फिर बम्ब फोड़ दिया
नहीं समझे
फिर हम इनकी इस निति को
इसमें शामिल
उनके मतों की राजनीती को
समय बदला
जगह बदली बदल गए हत्यार
दुनिया में आगे जाने की चाहत को हर बार मिटाया इन्होने
हमारे ही लोगो हमारे खिलाफ हत्यार बनाया इन्होने
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई धर्मो को ये आगे लाये
इनको ही आड़ बनाकर इन्होने इन्सान लड़ाए
इनता कुछ होने पर भी फिर से देता हे ललकार
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