Thursday, 8 December 2011

माँ तू इतनी अच्छी क्यों होती हे


जिसने पाला पोसा और बड़ा किया
जिसने उसे उसके पेरो पैर खड़ा किया
जिसने उसकी खातिर कई राते जागते जागते काट दी
जिसने अपने हिस्से की खुसिया हस्ते हस्ते बाट दी
जो कभी उसे बचाने को सबसे लड़ जाती थी
जो गलत होने पर भी उसको ही सही बताती थी
वो क्यों हमे सुख दे खुद गम सहती हे
ऐ माँ तू इतनी अच्छी क्यों होती हे

किसी का हो मुझपर वार तु ढल बन जाती थी
मुझे हर नजर हर दुःख से बचाती थी
मेरी हर जिद को तु पूरा कर वाती थी
समझ आने पर बस मेरी आंखे भर आती थी
में वक्त बस एक बात सोचता था
कब होऊंगा  में बड़ा बस यही पूछता था
माँ मुझे छोड़कर कभी न जाना तू इकलोती हे
ऐ माँ तू इतनी अच्छी क्यों होती हे


मुझे मारकर वो  मुझको चुप कराती थी
फिर एक कोने में जा वो क्यों अंशु बहती थी
उसकी वो मर मुझे लगती थी उसके प्यार के सामान
उस वक्त मेरा सब कुछ था उसकी  खुसी पर  कुर्बान
आज में उस काबिल होकर भी उसके अंशु रोक नहीं पता
उसके हर एक अंशु से  मुझे डर क्यों  हे लग जाता
शयद इसी लिए वो मेरे सामने नहीं रोती हे
ऐ माँ तू इतनी अच्छी क्यों होती हे

बड़ा होने के बाद  क्यों तुझसे अलग होना चाहता था
क्यों दोस्रो की गलती पर भी तुझे समझाता था
शयद में तेरे बलिदानों को भूलने लगा था
अब तेरी नोका को छोड़ खुद की नोका में झूलने लगा था
पर एक दिन फिर तुझे पाने की आस थी
बातो में नहीं तू दिल में खास थी
क्यों तू थिदा पाकर इतना खोती हे

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