Thursday, 8 December 2011

अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना


अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना
महबूब का अपनी मोह्हबत की खातिर जन गवाना
वो चला जाता हे इस जहा से गलती ज़माने की थी
अब बाकि रह जाता उसका उनकी गलती पर पछताना
वो भी उसकी याद में तड़प तड़प कर मर जाती हे
क्योकि मुस्किल होता इतना सब होने पैर जिन्दा रह पाना
अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना

कोई नहीं एसी मोह्हबत जो पूरी हो पाई हे
जिसमे लेला अंत में मजनू की बाहों में समाई हे
कभी फासी तो कभी आग के हवाले कर दिया जाता हे
नजाने कितनी आँखों में ये अंशु लेकर आयी हे
जब हे इतनी दर्दनाक तो क्यों होती हे मोहब्बत
और क्यों मुस्किल होता हर आशिक का इससे बचपना 
अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना

मरते दम उनकी आंखे खुली रह जाती हे
जुबा उनकी कुछ खेते खेते ठुम जाती हे
और वो उसका नाम अलाप रहा था
बाद पता पड़ने पर मसुक बहुत पछताती हे
वो दिन रत बस इस सोच में डूबी रहती हे
आखिर क्युउसने चाहा था उसको पाना
अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना


कोई आखिर इस मोहब्बत से केसे बच पायेगा
जिसमे भी होगा दिल वो इसमें फस जायेगा
क्योकि दिल से दिल का मेल ही तो होता हे इसमें
पड़ कर इसमें वो बस अंशु ही बहाएगा
फिर याद  आयेगा  उसको दोस्त का समझाना 
अक्सर आम होता हे मोह्हबत में जानो का जाना

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