Wednesday, 7 December 2011

में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे


                                          में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे 


                                                          
  में अपनी चादर को नाप कर सोया करता हु
फूथ्पाथ पर ठण्ड में बेठ कर रोया करता हु
में अपनी गरीबी को हर पल कोसा करता हु
आँखों में आंशु भर यही सोचा करता हु
के मेरे चहेरे पर दर्द और तेरे चहेरे पर मुस्कान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे

तुझे बुलाया जाता हे हर छोटी छोटी बात पर
मुझे रुलाया जाता हे होने वाली हर मुलाकात पर
मुझे नहीं माना जाता हिस्सा इस समाज का
नहीं होता हे कोई फर्क मेरी दर्द भरी आवाज का
मुझे दिया धिक्कार तुझे दिया इन्होने सम्मान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे

बाट दिया हमको इन्होने दो अलग हिस्सों में
खुश होते हे ये हमारे दर्द भरे किस्सों में
हमे २ गज जमी नसीब नहीं होतो मरने के लिए
उन्हें बाट दी जाती हे अयसी करने के लिए
धरती तो बाट चुकी बस बचा एक असमान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे

चलता हु घर में ही इन पेसेवालो का
आता हे मेरी ही मेहनत से खर्चा इनके प्यालो का
अगर यु ही चलता रहा मिट जाऊंगा में एक दिन
नहीं जे सकते ये हम गरीबो के बिन
तो क्यों करते ये अपने लिए हमे कुर्बान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे







मेरी गरीबी को देख जमाना मुस्कुराता हे
तेरी शोहरत के आगे ये सर झुकता हे 
तेरे गलती को भी ये सही करार देता हे
मेरे सही पर भी ये मुझे मर देता हे
तेरे सूख में हे सुखी और मेरे दुःख से अनजान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे



में एक जोड़ी कपडे में ही मर जाया करता हु
पेट भर खाना तो कभी कभी काया करता हु
तुने कपड़ो का भंडार लगा लिया
खाना तुने तो क्या तेरे कुत्ते ने भी खा लिया
कुत्तो को करते हे प्यार मेरे करता अपमान हे
क्यों हे इतना फर्क जब हम दोनों एक सामान हे
में भी तो इन्सान हु और तू भी तो इन्सान हे

No comments: