कबीरा के दोहे सुने हे मीरा की वाणी सुनी हे
देख में पाया उन्हें ना किस्से और कहानी सुनी हे
इस कलम के वो सिपाही जिन्दा हे अब भी दिलो में
जान भर दी लड़ने की हम जेसे बुजदिलो में
इस कलम की अलग हे ताकत और हे इसकी बात न्यारी
जब जब उठाया इसने जिम्मा बदल के रख दी दुनिया सारी
कभी तो इसने वो लिखा किसी ने सोचा भी ना था
पहुच गयी पल वहा जहा कोई पहुचा भी ना था
इसने किया हर अमोखाश की आवाज को बुलंद
इसने हे फेलाई मेरे बगीचे में पुष्पों की सुघंद
कर दिया ख़तम इसने सासन जो था अत्याचारी
जब जब उठाया इसने जिम्मा बदल के रख दी दुनिया सारी
दिल के हालातो को ये तो बाया करना भी जानती हे
खुद की ताकत को भी अच्छी तरह से पहचानती हे
ना इसको अपनी ताकत का फिर भी खुमार हे
बिक नहीं सकती हे क्योकी दोलत तो बेशुमार हे
अपनी सच्चाई बल के पुश खिलाये क्यारी क्यारी
जब जब उठाया इसने जिम्मा बदल के रख दी दुनिया सारी
लेखा जोखा मिट भी जाये पर छाप छुट ही जाती हे
रगड़ रस्सी की पत्थर से क्या कभी मिट पाती हे
बेघर करो हमे तुम कितना दिल में जगह बनायंगे
अपने हटो की लकीरों को बदल हम जायंगे
उठा कलम हमको करनी हे अब तो युद्ध की तयारी
जब जब उठाया इसने जिम्मा बदल के रख दी दुनिया सारी

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