कोई उससे पूछे
किसी का जाने
का दुःख आखिर
क्या होता हे
जनता हु वो
पेरो
के नीचे जमीन
नहीं रहती
उनके चले जाने
पर राह हसीन
नहीं होती
हर और हर
कोई बस घूरता
सा रहता हे
क्या जानते हो एक
बच्चा सब केसे
सहता हे
वो आँखों में आंखे
डालता हे उनकी
पर छुप कर
रोता हे
कोई उससे पूछे
किसी का जाने
का दुःख आखिर
क्या होता हे
वो क्या जाने
उस दुःख जिसके
हर मुराद पुरी
होती हे
जनता हे वही
जिसकी माँ एक
कमरे में छुप
कर रोती हे
आने पर उसके
वो अंशु छुपती
हे अपने
दुनिया से लड़
कर भी वो
उसे दिखती हे
सपने
वो सब कुछ
पा ले पर
हर पल कुछ
न कुछ खोता
हे
कोई उससे पूछे
किसी का जाने
का दुःख आखिर
क्या होता हे
वो प्रार्थना करता हे
उस खुदा से
के भविष्यसुधर जाये
वर्तमान तो बीत
रहा गरीबी में
पर आगे कुछ
उभर जाये
वो खुसी दे
सके उनको जो
उसके हक़दार हे
कूके उतार नहीं
सकता किया जाने
कितने उपकार हे
वो अपनी खुसी
को दाव लगा
उनकी खुसी संजोता
हे
कोई उससे पूछे
किसी का जाने
का दुःख आखिर
क्या होता हे
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