अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा
जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा
अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा
आंख के
नयनसुख हे मन
के सूरदास
अमृत उन्हें
चखाते जिनको नहीं
थी प्यास
प्यासे अब भी
वो जिनको थी
जरुरत
देख लेता
पल भर उन
गरीबो की भी
सूरत
जनता हु
में ये के
बिन पानी कोई
क्या प्यास बुझाएगा
अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा
जिस पेसे का गुरुर हे तुझे बड़ा
याद रख के वो यही मिला पड़ा
जो भी कमाया क्या हे वो तेरी मेह्नातो का
या फिर सिला वो खुदा के रहमतो का
जो दिया हे उसने उसे छीन भी ले जायेगा
अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा
जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा
अकेले ही आये हो अकेले ही जाना हे
जहा की रीत हे इसको क्या बदल पाना हे
जिस देह पर इतना करतो हो तुम गुमान
कमजोरो को दिखाते हो इसकी क्यों तुम जान
खाक का बना हे खाक में दफ़न हो जायेगा
अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा
जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा
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