Tuesday, 24 January 2012

अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा



अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा


जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा


अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा


आंख के नयनसुख हे मन के सूरदास


अमृत उन्हें चखाते जिनको नहीं थी प्यास


प्यासे अब भी वो जिनको थी जरुरत


देख लेता पल भर उन गरीबो की भी सूरत


जनता हु में ये के बिन पानी कोई क्या प्यास बुझाएगा


अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा


जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा


जिस पेसे का गुरुर हे तुझे बड़ा


याद रख के वो यही मिला पड़ा


जो भी कमाया क्या हे वो तेरी मेह्नातो का


या फिर सिला वो खुदा के रहमतो का


जो दिया हे उसने उसे छीन भी ले जायेगा


अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा


जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा


अकेले ही आये हो अकेले ही जाना हे


जहा की रीत हे इसको क्या बदल पाना हे


जिस देह पर इतना करतो हो तुम गुमान


कमजोरो को दिखाते हो इसकी क्यों तुम जान


खाक का बना हे खाक में दफ़न हो जायेगा


अन्धो के शहर बेच आइने तू क्या कमाएगा


जो भी तुझपर बाकि वो भी गवायेगा

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