Wednesday, 27 June 2012



बेसक जुबा पर लगी हो मेरे लगाम
पर मेरी आँखों में सब कुछ देता हे दिखाई

और जरुरी नहीं कितनी हे मोहब्बत बया करनी
दिल मिलो हो बिन कहे सब देता हे सुनाई

खुदखुसी करने को तो सिर्फ दो बुँदे ही काफी हे
और किसी को कम रह जाती हे सागर की गहराई

वेसे तो तुम हर वक्त खुबसूरत दिखा करती हो
पर तब तो हद हो गई जब तुम थोडा सा शरमाई

क्या करूँगा इस दुनिया का दीदार करके में 
तू सामने हे और सारी दुनिया तुझमे हे समाई

खुदा ने सोचा की तुझको कुछ गम अता कर दू 
सच कहता हु मेने खुदा से भी कर ली लड़ाई

मेरी सांसो ने इक पल के तेरा नाम लेना क्या छोड़ा
मेने अपनी सासों से भी कर ली बेवफाई 

सोते जागते बस तू ही दिखाई देती हे मुझको 
क्योकि तेरी ही सूरत मेने आँखों में बसाई

सहने को तो बड़े बड़े जख्मो का दर्द नहीं होता
पर सह नहीं सकता में तुझसे इक पल की जुदाई

आज भी इक सवाल हर पल परेशान किया करता हे 
जब तुझको थी ना मोहब्बत तो मुझे देख क्यों मुस्काई

मेरा इससे ज्यादा बुरा हशर क्या होगा 
तेरे बिना जीने की बात मेरी समझ में न आई

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