Monday, 18 June 2012






खुदा अपने दर की कुछ तो तू लाज रख ले
यहाँ से गया ना अब तक कोई हाथ खाली हे

अपनी ओलाद से माँ बाप हो सकते हे खफा
पर किसी ने अब तक कोई बद्दुआ ना निकली हे 

कर रहा तू भेद क्यों इतना उनमे और मुझमे हे
जबकि में भी एक सवाली हु  वो भी एक सवाली हे

तुझको एक पल ना लगेगा सब कुछ बर्बाद करने में
पर जनता हु के तू ही इस बगीचे का माली हे 

कोई कमी रह गई थी मेरी फरियाद में शायद
तभी तो आज तलक मेरे सामने रखी सुखी थाली हे 

जिनके सर साया तेरा होता नहीं मेरे खुदा
उनके घर में मनती कहा होली और दिवाली हे

कह रहा हु में तो बस बाया  तजुर्बा अपना
मत समझना के सुनाई कोई गजल या कव्वाली हे


सोचता था हे नहीं इस जहाँ में तेरा वजूद
भूल बेठा के तुने ही ये दुनिया यु संभाली हे 

खुदा अपने दर की कुछ तो तू लाज रख ले
यहाँ से गया ना अब तक कोई हाथ खाली हे






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