Monday, 4 June 2012

तू अकेला हे

नजर उठा के देख तो ये जहा दूर दूर तक फेला हे
क्यों होता हे पागल बन्दे क्यों रहता तू अकेला हे

खुद को करके बंद कमरे में आखिर क्या तू पा लेगा
जग की आंखे नम ना होंगी खुद को ही तू रुला लेगा
मिल जा जहा के लोगो में बन जा तू भी उनके जेसा
जिनका कोई इमान नहीं हे और  धर्म हुआ उनका पैसा

सूरत तो चमकाए फिरते बेसक मन अन्दर से मेला हे  
क्यों होता हे पागल बन्दे क्यों रहता तू अकेला हे

बदलना हे तुझको सब कुछ बाहर तो आना ही होगा
लेनी सुघंद जो नीरज की कीचड़ में जाना ही होगा
खुद की आंखे नम करके यहाँ कुछ भी ना बदलेगा
करके बर्बाद जीवन को तू खुद को ही बस ठगलेगा

खुद चुप बेठा हे जब तू क्यों कहता सब को झेमला हे
क्यों होता हे पागल बन्दे क्यों रहता तू अकेला हे

उसको इतना चाहा और उसने ही दिल तोड़ दिया
तुने उसकी खातिर इस जहा से रिश्ता तोड़ दिया
मोहब्बत का क्या हे ये फिर से तुझको मिल जायगी
जुदा होकर तुझे अब ज्यादा पल ये ना रह पायेगी

बेवफा थी जिसने तेरा साथ मोहब्बत का खेल खेला हे
क्यों होता हे पागल बन्दे क्यों रहता तू अकेला हे


नजर उठा के देख तो ये जहा दूर दूर तक फेला हे
क्यों होता हे पागल बन्दे क्यों रहता तू अकेला हे


राज



No comments: