Friday, 4 May 2012

buuda hoga tera baap



कभी कभी जिन्दगी में कुछ अनोखी बाते हो जाती हे
बल नहीं जाता उसका बेसक रस्सी जल जाती हे
वो अपनी उम्र के हिसाब से जीने में दिक्कत मानता हे
जवानी की याद उसे हर पल तडपती हे
वो दुसरो के बुड्डा कहने पर चिड जाता हे
उन्हें मरता हे और उसके मुह से गली निकल जाती हे
कभी कभी जिन्दगी में कुछ अनोखी बाते हो जाती हे
बल नहीं जाता उसका बेसक रस्सी जल जाती हे
वो नहीं करता अपनी उम्र का लिहाज
देखता हे अब भी खेलने कूदने के ख्वाब
वो खेल तो ले लेकिन अब उसकी हड्डिय जवाब दे जाती हे
कभी कभी जिन्दगी में कुछ अनोखी बाते हो जाती हे
बल नहीं जाता उसका बेसक रस्सी जल जाती हे
नकली हे दात उसके कवाब कहने की हिरस करता हे
आजकल दल रोटी कहने में उसकी बतीसी निकल जाती हे
आखिरी पड़ाव पर बेठा हे अपनी जिन्दगी के
देख बुदिया को उसकी अब भी नियत फिसल जाती हे
बालो को क्र काला मुझे इमरान वाली रखता हे
बीडी पिता हे और उसको सिगार समझता हे
और धुआ नजाने कोन से अंदाज में उडाता हे
देख किसी हसीना को वो उसे पटाता हे
उसने नहीं मालूम के इस बुदापे में लड़की नहीं पट पाती हे
कभी कभी जिन्दगी में कुछ अनोखी बाते हो जाती हे
बल नहीं जाता उसका बेसक रस्सी जल जाती हे
पोता पोती का होकर वो काम छिछोरे करता हे
परेशान वो हसिनाओ को श्याम सवेरे करता हे
शर्म नहीं अति उसको डर का उसे पता नहीं
अब तक शयद वो किसी के हटो से हे पिटा नहीं
हर अन उसका बोल रहा अब दवाई उसे चलती हे
कभी कभी जिन्दगी में कुछ अनोखी बाते हो जाती हे
बल नहीं जाता उसका बेसक रस्सी जल जाती हे


No comments: